झारखंड में ज़मीन के दो रिकॉर्ड चलते हैं। खतियान पुराना अभिलेख है, जो सर्वे के समय बना और बताता है कि उस समय ज़मीन किसके नाम थी। रजिस्टर II मौजूदा रिकॉर्ड है, जिसमें आज का मालिक और लगान दर्ज रहता है।
दोनों राज्य के पोर्टल पर मुफ़्त देखे जा सकते हैं। यह पन्ना वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बताता है, और वह बात भी जो झारखंड में सबसे ज़्यादा मायने रखती है: हर ज़मीन बिकने लायक़ नहीं होती। हमारे रिकॉर्ड में झारखंड के 24 ज़िले, 260 प्रखंड और 31,201 गाँव दर्ज हैं।

पोर्टल कौन सा है
राज्य का land record पोर्टल jharbhoomi.jharkhand.gov.in है, जिसे राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग चलाता है। देखने के पैसे नहीं लगते।
वहाँ तीन विकल्प सबसे काम के हैं: अपना खाता देखें, जिससे रजिस्टर II खुलता है; खतियान देखें; और भू-लगान, जिससे बकाया देखा और जमा किया जाता है। बाक़ी विकल्प दाखिल ख़ारिज के आवेदन और उसकी स्थिति के लिए हैं।
ज़िला, अंचल, मौज़ा
पहले ज़िला चुना जाता है, फिर अंचल। अंचल वही है जिसे आम बोलचाल में प्रखंड या ब्लॉक कहते हैं, और उसके नीचे मौज़ा यानी गाँव आता है।
मौज़ा की सूची लंबी होती है और नाम आपस में मिलते-जुलते होते हैं। अपना गाँव किस अंचल में आता है यह पहले से पक्का कर लेना खोज आसान कर देता है, और यह झारखंड के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है।
रजिस्टर II कैसे खोलें
मौज़ा चुनने के बाद खोजने के कई रास्ते मिलते हैं: खाता संख्या से, खेसरा संख्या से, या रैयत यानी मालिक के नाम से। झारखंड में खेत की संख्या को खेसरा कहते हैं।
खाता संख्या से खोजने पर उस खाते की पूरी ज़मीन एक साथ दिखती है। नाम से खोजने पर एक जैसे नाम कई निकलते हैं, इसलिए पिता के नाम से मिलान करना ज़रूरी है। खसरा और खाता का फ़र्क़ समझ लेने पर यह चुनाव आसान हो जाता है।

रजिस्टर II में क्या दिखता है
ऊपर रैयत का नाम और पिता का नाम रहता है, उसके नीचे खाता, खेसरा और रकबा। सबसे नीचे लगान की राशि और यह कि आख़िरी बार कब तक का भुगतान दर्ज है।
रकबा यहाँ डिसमिल और एकड़ में लिखा मिलता है। ज़मीन की क़िस्म वाला ख़ाना बताता है कि वह धान वाली है, टाँड़ है, या घर वाली, और इसी से तय होता है कि उस पर क्या किया जा सकता है।
झारखंड पहले बिहार का हिस्सा था, इसलिए शब्दावली दोनों में मिलती-जुलती है, पर पोर्टल और मौजूदा रिकॉर्ड का नाम अलग है। बिहार वाली व्यवस्था बिहार भूमि वाली पोस्ट में दी है।
खतियान अलग काग़ज़ है
खतियान पुराने सर्वे का अभिलेख है, इसलिए उसमें दर्ज नाम आज का मालिक नहीं भी हो सकता। लोग अक्सर खतियान दिखाकर मान लेते हैं कि रिकॉर्ड उनके नाम है, जबकि आज का नाम रजिस्टर II में देखा जाता है।
फिर भी खतियान की अहमियत कम नहीं है। पुश्तैनी दावे में, बँटवारे में, और यह साबित करने में कि ज़मीन परिवार की कब से है, यही सबसे मज़बूत काग़ज़ माना जाता है। इसीलिए उसकी नक़ल निकालकर रख लेना चाहिए।
हर ज़मीन बिकने लायक़ नहीं होती
झारखंड की बड़ी हिस्सेदारी उन क़ानूनों के दायरे में आती है जो आदिवासी ज़मीन की बिक्री पर रोक लगाते हैं। राज्य के एक हिस्से में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू होता है और दूसरे हिस्से में संताल परगना काश्तकारी अधिनियम।
इन क़ानूनों के तहत आने वाली ज़मीन किसी भी ख़रीदार को नहीं बेची जा सकती, और कई मामलों में उपायुक्त की अनुमति के बिना कोई हस्तांतरण मान्य नहीं होता। यह बात रजिस्ट्री से पहले देखी जानी चाहिए, क्योंकि रोक के बावजूद हुआ सौदा बाद में रद्द हो जाता है और पैसा फँसता है।
भू-लगान और उसकी रसीद
लगान जमा करना और रसीद निकालना, दोनों इसी पोर्टल से होते हैं। इसके लिए खाता और खेसरा की जानकारी चाहिए, जो रजिस्टर II खोलने पर मिल जाती है।
रसीद संभालकर रखिए। यह सबसे आसानी से मिलने वाला काग़ज़ है जो दिखाता है कि रिकॉर्ड में आपका नाम चल रहा है, और कई आवेदनों में इसी की माँग होती है। पुरानी रसीदें भी काम आती हैं क्योंकि वे लगातार क़ब्ज़े का सिलसिला दिखाती हैं।
दाखिल ख़ारिज अलग काम है
रजिस्ट्री हो जाने से रजिस्टर II में नाम अपने आप नहीं बदलता। ख़रीद या विरासत के बाद दाखिल ख़ारिज का आवेदन अलग से देना पड़ता है, और झारखंड में वह इसी पोर्टल से दिया जा सकता है।
आवेदन के बाद अंचल कार्यालय जाँच करता है और आपत्ति की अवधि चलती है। पूरी प्रक्रिया, काग़ज़ और समय-सीमा दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में दी है।
नक़्शा अलग जगह मिलता है
रजिस्टर II यह नहीं बताता कि खेत मौज़ा में कहाँ पड़ता है। उसके लिए नक़्शा देखना पड़ता है, जो राज्य ने अलग पोर्टल पर रखा है और मौज़ा के हिसाब से खुलता है।
नक़्शा और रिकॉर्ड मिलाकर देखना ख़रीदते समय ज़रूरी है। काग़ज़ पर रकबा सही होने के बावजूद टुकड़ा दूसरी जगह निकलना आम शिकायत है, और यह सिर्फ़ नक़्शे से पकड़ में आता है।
ग़लती दिखे तो
नाम की वर्तनी, पिता का नाम या रकबा ग़लत दर्ज हो तो सुधार का आवेदन अंचल कार्यालय में दिया जाता है। साथ में वह काग़ज़ लगाइए जिसमें सही जानकारी है, जैसे पुराना खतियान या लगान रसीद।
कोई और भी उसी खेसरा पर दावा करता हो, तो अंचल कार्यालय उसे सुधार नहीं मानता और मामला आगे बढ़ता है। दोनों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।
ऑनलाइन नक़ल कहाँ चलती है और कहाँ नहीं
पोर्टल से निकली साधारण नक़ल देखने और अपने पास रखने के लिए है। किसी सरकारी आवेदन, बैंक या अदालत में वही प्रति चलती है जिस पर विभाग की मुहर या डिजिटल हस्ताक्षर हो।
इसलिए काम के हिसाब से तय कीजिए कि कौन सी चाहिए। जहाँ सिर्फ़ जानकारी चाहिए, वहाँ मुफ़्त नक़ल काफ़ी है; जहाँ काग़ज़ जमा करना है, वहाँ अंचल कार्यालय से प्रमाणित प्रति लेनी पड़ती है।
रिकॉर्ड में नाम और आधार का मिलान
ज़मीन से जुड़ी ज़्यादातर योजनाओं में रिकॉर्ड का नाम आधार के नाम से मिलाया जाता है। दोनों में वर्तनी अलग हो तो आवेदन जाँच में अटक जाता है।
इसलिए रजिस्टर II में दर्ज नाम और आधार का नाम एक जैसा रखिए। जहाँ फ़र्क़ हो, वहाँ पहले सुधार करा लेना बेहतर है, वरना हर आवेदन में वही अड़चन दोहराती रहेगी।
पुराने काग़ज़ संभालकर रखिए
झारखंड में पुश्तैनी दावे बहुत हैं और उनमें पुराना खतियान सबसे मज़बूत सबूत बनता है। डिजिटल रिकॉर्ड में आई ग़लती अक्सर तभी पकड़ में आती है जब उसकी तुलना पुराने काग़ज़ से की जाए।
इसीलिए वंशावली, पुरानी रसीदें और खतियान की नक़ल एक जगह रखिए। यही काग़ज़ बँटवारे, विरासत और सीमा के विवादों में सबसे पहले माँगे जाते हैं।
मोबाइल पर देखते समय
पोर्टल मोबाइल पर खुल जाता है, पर रिकॉर्ड तालिका के रूप में आता है और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाता है। रकबा और लगान वाले ख़ाने अक्सर उसी हिस्से में रहते हैं।
फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। लगान जमा करने की अवधि में पोर्टल धीमा रहता है, इसलिए रसीद का काम आख़िरी दिनों पर मत छोड़िए।
आवेदन की स्थिति और रसीद
दाखिल ख़ारिज या सुधार का आवेदन देने के बाद उसकी स्थिति पोर्टल पर आवेदन संख्या से देखी जा सकती है, और वहीं दिखता है कि फ़ाइल किस स्तर पर रुकी है।
रसीद के बिना यह भी नहीं दिखेगा, इसलिए आवेदन देते ही रसीद लीजिए। देरी होने पर शिकायत उसी संख्या के आधार पर दर्ज होती है।
याद रखने लायक़ बातें
खतियान और रजिस्टर II एक चीज़ नहीं हैं, और किसी सौदे में रजिस्टर II ही देखा जाता है। ख़रीदने से पहले यह भी देखिए कि ज़मीन किसी काश्तकारी क़ानून के दायरे में तो नहीं आती।
देखना मुफ़्त है और उसके लिए किसी बिचौलिए की ज़रूरत नहीं। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा झारखंड के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।
FAQs
यह झारखंड का मौजूदा भूमि रिकॉर्ड है, जिसमें आज का रैयत, खाता, खेसरा, रकबा और लगान दर्ज रहता है। खतियान पुराने सर्वे का अभिलेख है और उसमें दर्ज नाम आज का मालिक नहीं भी हो सकता।
नहीं। राज्य के एक हिस्से में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और दूसरे में संताल परगना काश्तकारी अधिनियम लागू है, जो आदिवासी ज़मीन के हस्तांतरण पर रोक लगाते हैं। रोक के बावजूद हुआ सौदा बाद में रद्द हो जाता है।
पोर्टल पर भू-लगान वाले विकल्प से, जिसके लिए खाता और खेसरा की जानकारी चाहिए। रसीद तुरंत निकल आती है और वही दिखाती है कि रिकॉर्ड में आपका नाम चल रहा है।
पुश्तैनी दावे, बँटवारे और सीमा के विवादों में यह सबसे मज़बूत काग़ज़ मानी जाती है। सर्वे के दौरान भी यही माँगी जाती है, इसलिए उसकी नक़ल निकालकर रख लेना चाहिए।