राजस्थान में ज़मीन का रिकॉर्ड जमाबंदी कहलाता है और वह राज्य के अपने पोर्टल पर मुफ़्त देखा जा सकता है। जमाबंदी में यह दर्ज रहता है कि किस खाते के नीचे कौन से खसरे आते हैं, उनका रकबा कितना है, और खातेदार कौन है।

यह पन्ना पूरा रास्ता बताता है: पोर्टल कौन सा है, गाँव तक कैसे पहुँचना है, खोजने के चारों विकल्प क्या हैं, और मुफ़्त नक़ल तथा हस्ताक्षरित नक़ल में क्या फ़र्क़ है। हमारे रिकॉर्ड में राजस्थान के 33 ज़िले, 232 तहसीलें और 40,819 गाँव दर्ज हैं।

राजस्थान अपना खाता: जमाबंदी नक़ल कैसे निकालें

पोर्टल कौन सा है

राजस्थान का land record पोर्टल apnakhata.rajasthan.gov.in है, जिसे राजस्व मंडल चलाता है। इसी व्यवस्था को ई-धरती भी कहा जाता है, इसलिए दोनों नाम एक ही चीज़ के लिए मिलते हैं।

घर पर राज्य का नक़्शा दिखता है और उस पर ज़िले पर क्लिक करके आगे बढ़ा जाता है। जिन्हें नक़्शे से चुनना मुश्किल लगे, उनके लिए नीचे ज़िलों की सूची भी रहती है, और दोनों रास्ते एक ही जगह पहुँचाते हैं।

ज़िला, तहसील, गाँव

ज़िला चुनने के बाद तहसील की सूची आती है और तहसील चुनने पर गाँवों की। गाँव के नाम राजस्व रिकॉर्ड की वर्तनी में लिखे होते हैं, जो बोलचाल के नाम से थोड़ा अलग हो सकते हैं।

राजस्थान में कई गाँवों के नाम के साथ उनका पुराना नाम भी चलता है, और सूची में वही दर्ज मिलता है। अपना गाँव किस तहसील में आता है यह पक्का कर लेना खोज को आसान बना देता है, और यह राजस्थान के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है।

खोजने के चार तरीक़े

गाँव चुनने के बाद पोर्टल चार विकल्प देता है और चारों एक ही जमाबंदी तक पहुँचाते हैं।

खाता संख्या से: खाता एक खातेदार की पूरी जोत का नंबर है, इसलिए इससे खोजने पर सारे खसरे एक साथ दिखते हैं। पुरानी नक़ल पास हो तो यह संख्या उसी पर लिखी रहती है।

खसरा संख्या से: जब किसी एक खेत का ब्यौरा चाहिए, तब यही सबसे सीधा रास्ता है। जमाबंदी में हर खसरे की अपनी पंक्ति होती है।

नाम से: कोई संख्या याद न हो तो खातेदार का नाम लिखकर सूची में से चुना जा सकता है। एक जैसे नाम कई निकलते हैं, इसलिए पिता के नाम से मिलान ज़रूरी है।

USN या GRN से: यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने पहले कभी आवेदन किया है और उनके पास वह संख्या मौजूद है।

राजस्थान अपना खाता: जमाबंदी नक़ल कैसे निकालें

नक़ल में क्या-क्या दिखता है

नक़ल के ऊपरी हिस्से में गाँव, तहसील और ज़िला रहता है, साथ में यह भी कि जमाबंदी किस वर्ष की है। राजस्थान में जमाबंदी हर कुछ साल में नए सिरे से लिखी जाती है, इसलिए वर्ष देखना ज़रूरी है।

नीचे तालिका में खाता संख्या, खसरा संख्या, रकबा, क़िस्म और खातेदार का नाम आता है। रकबा बीघा और बिस्वा में लिखा मिलता है, और कहीं-कहीं हेक्टेयर में भी, इसलिए इकाई देखकर ही गिनती कीजिए।

सूचनार्थ नक़ल और ई-हस्ताक्षरित नक़ल

पोर्टल पर जो नक़ल बिना शुल्क खुलती है, उस पर सूचनार्थ लिखा रहता है। वह देखने और अपने पास रखने के काम आती है, किसी दफ़्तर में जमा करने के नहीं।

जहाँ काग़ज़ जमा करना हो, वहाँ ई-हस्ताक्षरित नक़ल लगती है। उसके लिए मोबाइल नंबर पर OTP आता है और तय शुल्क देना पड़ता है। भुगतान के बाद जो फ़ाइल मिलती है उस पर सत्यापन संख्या छपी रहती है, जिससे कोई भी उसकी जाँच कर सकता है।

नामांतरण अलग काम है

ख़रीद, विरासत या बँटवारे के बाद जमाबंदी में नाम बदलवाना नामांतरण कहलाता है, और वह अपने आप नहीं होता। रजिस्ट्री अलग दफ़्तर में होती है और नामांतरण तहसील में।

राजस्थान में नामांतरण का आवेदन इसी पोर्टल से दिया जा सकता है और उसकी स्थिति भी वहीं दिखती है। प्रक्रिया और लगने वाले काग़ज़ दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में विस्तार से दिए हैं।

गिरदावरी फ़सल का रिकॉर्ड है

जमाबंदी यह बताती है कि ज़मीन किसकी है। गिरदावरी यह बताती है कि उस पर उस मौसम में क्या बोया गया। दोनों अलग रिकॉर्ड हैं और दोनों तहसील में रखे जाते हैं।

मुआवज़ा, फ़सल बीमा और कई किसान योजनाओं में गिरदावरी ही देखी जाती है, जमाबंदी नहीं। ओलावृष्टि या सूखे के बाद के दावों में यही सबसे ज़रूरी काग़ज़ बनता है, इसलिए हर मौसम में उसका सही दर्ज होना देख लेना चाहिए।

पड़ोसी मध्य प्रदेश में यही काम खसरा और B1 से होता है, और वहाँ गाँव तक पहुँचने के लिए हल्का भी चुनना पड़ता है। वह तरीक़ा MP भूलेख वाली पोस्ट में दिया है।

नक़्शा अलग पोर्टल पर है

जमाबंदी से यह पता नहीं चलता कि खेत गाँव में कहाँ पड़ता है। उसके लिए भू नक़्शा देखना पड़ता है, जो राजस्थान में अलग पोर्टल पर रखा गया है।

वहाँ ज़िला, तहसील और गाँव चुनने के बाद नक़्शे में खसरा संख्या पर क्लिक करने से उस टुकड़े का ब्यौरा खुलता है। ख़रीदते समय नक़्शा और जमाबंदी दोनों मिलाकर देखिए, क्योंकि रकबा सही होने पर भी टुकड़ा दूसरी जगह निकल सकता है।

ग़लती दिखे तो

नाम की वर्तनी, पिता का नाम या रकबा ग़लत दर्ज हो तो सुधार तहसील में होता है। आवेदन तहसीलदार को दिया जाता है और पटवारी मौक़े पर जाँच करके रिपोर्ट लगाता है।

सीधी लिपिकीय भूल कुछ हफ़्तों में ठीक हो जाती है, बशर्ते उसी ज़मीन पर किसी और का दावा न हो। दोनों स्थितियों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।

एक खाते में कई हिस्सेदार

पुश्तैनी ज़मीन में एक ही खाते के नीचे कई नाम दर्ज मिलते हैं, हिस्सा दिखाते हुए। यह ग़लती नहीं है, संयुक्त खातेदारी है।

ऐसी ज़मीन बेचने में सब हिस्सेदारों की सहमति लगती है। बँटवारा दर्ज कराने के बाद हर हिस्से का अपना खाता बन जाता है, और उसके बाद सौदा सीधा हो जाता है।

जमाबंदी का वर्ष क्यों देखना चाहिए

राजस्थान में जमाबंदी हर कुछ वर्ष पर नए सिरे से तैयार होती है, और पोर्टल पर पुरानी तथा नई, दोनों दिख सकती हैं। नक़ल के ऊपर लिखा वर्ष इसीलिए सबसे पहले देखने लायक़ चीज़ है।

पुरानी जमाबंदी ग़लत नहीं होती, पर उसमें वह बदलाव दर्ज नहीं होता जो उसके बाद हुआ है। सौदे या आवेदन में हमेशा नवीनतम जमाबंदी लगती है, जबकि पुराना दावा साबित करने में पुरानी ही सबसे काम आती है।

नहरी इलाक़े में मुरब्बा और किला

गंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे नहरी ज़िलों में ज़मीन की पहचान का ढाँचा अलग है। वहाँ खसरा संख्या के साथ मुरब्बा और किला संख्या भी चलती है, क्योंकि ज़मीन चकबंदी के समय चौकोर टुकड़ों में बाँटी गई थी।

ऐसी जगहों पर नक़ल में यही संख्याएँ दर्ज मिलती हैं, और उन्हीं से खोजना पड़ता है। राज्य के बाक़ी हिस्सों का ढाँचा इससे अलग है, इसलिए किसी और ज़िले का तरीक़ा यहाँ लागू करने की कोशिश मत कीजिए।

मोबाइल पर देखते समय

पोर्टल मोबाइल पर खुल जाता है, पर जमाबंदी तालिका चौड़ी होती है और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाती है। रकबा और क़िस्म वाले ख़ाने अक्सर उसी कटे हिस्से में रहते हैं।

फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। गिरदावरी के मौसम में पोर्टल पर भीड़ बढ़ जाती है, क्योंकि पटवारी और आवेदक दोनों एक ही समय पर उसे खोलते हैं।

ई-मित्र से भी यही काम होता है

जिनके पास इंटरनेट या स्मार्ट फ़ोन नहीं है, वे ई-मित्र केंद्र से भी नक़ल निकलवा सकते हैं। वहाँ वही पोर्टल खुलता है और तय शुल्क की रसीद मिलती है।

रसीद ज़रूर लीजिए, क्योंकि शुल्क तय है और उससे ज़्यादा माँगने की शिकायत उसी रसीद के आधार पर होती है। घर से देखना हमेशा मुफ़्त रहता है, इसलिए सिर्फ़ देखने के लिए केंद्र जाने की ज़रूरत नहीं।

याद रखने लायक़ बातें

देखना मुफ़्त है और उसके लिए न खाता बनाना पड़ता है, न OTP आता है। OTP और शुल्क सिर्फ़ ई-हस्ताक्षरित नक़ल में लगते हैं, और यही दोनों के बीच का असली फ़र्क़ है।

साल में एक बार अपनी जमाबंदी देख लेना अच्छी आदत है, ख़ासकर बँटवारे या बिक्री के बाद। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा राजस्थान के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।

FAQs

हाँ। राजस्थान की भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था को दोनों नामों से जाना जाता है, और जमाबंदी नक़ल उसी एक पोर्टल से निकलती है।

सूचनार्थ नक़ल मुफ़्त है और सिर्फ़ देखने के काम आती है। जहाँ काग़ज़ जमा करना हो वहाँ ई-हस्ताक्षरित नक़ल लगती है, जिसके लिए OTP आता है और तय शुल्क देना पड़ता है।

गिरदावरी फ़सल का रिकॉर्ड है, यानी उस मौसम खेत में क्या बोया गया। मुआवज़ा, फ़सल बीमा और कई किसान योजनाओं में यही देखा जाता है, जमाबंदी नहीं।

राजस्थान में जमाबंदी हर कुछ वर्ष पर नए सिरे से तैयार होती है। किसी सौदे या आवेदन में नवीनतम जमाबंदी लगती है, जबकि पुराना दावा साबित करने में पुरानी वाली काम आती है।