ज़मीन ख़रीदने के बाद सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी यही है कि रजिस्ट्री हो गई तो काम पूरा हो गया। रजिस्ट्री यह दर्ज करती है कि सौदा हुआ। राजस्व रिकॉर्ड में मालिक का नाम बदलने का काम अलग है, और उसे दाखिल ख़ारिज कहते हैं।

जब तक यह न हो, खसरा या जमाबंदी में पुराने मालिक का ही नाम दिखता रहेगा। लगान उसी के नाम बनेगा, और किसान योजनाओं या मुआवज़े में भी वही नाम आएगा, चाहे रजिस्ट्री आपके नाम की हो।

नाम एक नहीं, कई हैं

यही काम राज्य के हिसाब से अलग नाम से जाना जाता है, और यह उलझन आम है। अंग्रेज़ी में इसे म्यूटेशन कहते हैं, उत्तर भारत में दाखिल ख़ारिज, गुजरात में फेरफार, और दक्षिण के कई राज्यों में अलग शब्द।

नाम चाहे जो हो, प्रक्रिया लगभग एक जैसी है। म्यूटेशन का मतलब अलग पन्ने पर संक्षेप में दिया गया है।

दाखिल ख़ारिज क्या है और कैसे कराया जाता है

कब-कब कराना पड़ता है

सिर्फ़ ख़रीद-बिक्री पर नहीं। विरासत में ज़मीन मिलने पर, बँटवारा होने पर, दान या गिफ़्ट डीड होने पर, और अदालत के आदेश से मालिकाना बदलने पर, हर बार रिकॉर्ड अलग से बदलवाना पड़ता है।

विरासत वाला मामला सबसे ज़्यादा टाला जाता है। पिता के नाम की ज़मीन वर्षों तक उन्हीं के नाम चलती रहती है, और बाद में जब बेचने या ऋण लेने की नौबत आती है, तब पूरी प्रक्रिया एक साथ करनी पड़ती है।

आवेदन कहाँ और किसके पास

आवेदन तहसील या हलक़े के राजस्व कार्यालय में दिया जाता है। गाँव स्तर पर रिकॉर्ड पटवारी या लेखपाल रखता है, और मंज़ूरी तहसीलदार या समकक्ष अधिकारी देता है।

कई राज्यों में यह अब ऑनलाइन भी होता है, जहाँ आवेदन पोर्टल से जमा होकर वहीं ट्रैक किया जा सकता है। राज्यवार पोर्टल और वहाँ की शब्दावली ज़मीन के रिकॉर्ड वाले हिस्से में दी गई है।

दस्तावेज़ जो लगते हैं

मामले के हिसाब से बदलते हैं, पर मूल सूची यही रहती है।

दाखिल ख़ारिज क्या है और कैसे कराया जाता है

विरासत के मामले में रजिस्ट्री की जगह मृत्यु प्रमाण पत्र और वारिस प्रमाण पत्र लगते हैं। बँटवारे में सभी हिस्सेदारों की सहमति का काग़ज़ चाहिए, और एक भी हिस्सेदार असहमत हो तो मामला अदालत की ओर जाता है।

आपत्ति की अवधि

आवेदन दर्ज होने के बाद एक सूचना जारी होती है ताकि जिसे एतराज़ हो वह सामने आ सके। यह अवधि राज्य के हिसाब से अलग होती है और इसी दौरान विवाद सामने आते हैं।

कोई आपत्ति न आए तो मंज़ूरी मिल जाती है और नाम रिकॉर्ड में चढ़ जाता है। आपत्ति आ जाए तो सुनवाई होती है, और तब मामला महीनों खिंच सकता है।

ज़मीन ख़रीदने से पहले यह देखिए

बेचने वाले का नाम रिकॉर्ड में दर्ज है या नहीं, यह पहली जाँच है। अगर उसने ख़ुद दाखिल ख़ारिज नहीं कराया है, तो रिकॉर्ड में अब भी उससे पहले वाले का नाम होगा और आपका अपना दाखिल ख़ारिज उलझ जाएगा।

दूसरी जाँच यह कि कोई प्रविष्टि लंबित तो नहीं। लंबित मामला बाद में मालिकाना बदल सकता है, और यह बात रिकॉर्ड की नक़ल में साफ़ लिखी रहती है।

अटक जाए तो

पोर्टल पर स्थिति देखिए और पता कीजिए कि मामला किस स्तर पर रुका है। अक्सर वजह छोटी होती है, जैसे कोई दस्तावेज़ अधूरा या पटवारी की रिपोर्ट बाक़ी।

बिना कारण लंबे समय तक रुका रहे तो तहसीलदार के पास लिखित शिकायत दीजिए, और उसके बाद उपमंडल अधिकारी या ज़िला राजस्व अधिकारी के पास अपील का रास्ता खुला रहता है।

रजिस्ट्री और दाखिल ख़ारिज, दो अलग दफ़्तर

रजिस्ट्री उप निबंधक कार्यालय में होती है और वहाँ यह दर्ज होता है कि दो पक्षों के बीच सौदा हुआ। दाखिल ख़ारिज तहसील में होता है और वहाँ यह दर्ज होता है कि ज़मीन अब किसके नाम है।

दोनों अलग विभाग हैं और एक से दूसरे को सूचना अपने आप नहीं जाती, कम से कम हर राज्य में नहीं। इसीलिए रजिस्ट्री के बाद अलग से आवेदन देना पड़ता है, और यही बात बहुत लोगों को महीनों बाद पता चलती है।

न कराने पर क्या होता है

ज़मीन आपकी रहती है, क्योंकि रजिस्ट्री अपने आप में मालिकाने का दस्तावेज़ है। पर राजस्व रिकॉर्ड पुराने नाम पर चलता रहता है, और सरकारी काम उसी रिकॉर्ड से चलते हैं।

इसका मतलब है कि किसान योजनाओं का पैसा, फ़सल बीमा, मुआवज़ा और ऋण, सब उसी पुराने नाम पर बनेंगे। बेचने की नौबत आने पर ख़रीदार रिकॉर्ड देखेगा और वहाँ आपका नाम न पाकर पीछे हट सकता है।

पुराना बकाया रास्ता रोकता है

अगर ज़मीन पर लगान बकाया है, या कोई सरकारी देनदारी दर्ज है, तो दाखिल ख़ारिज उसी में अटक जाता है। यह ख़रीदने से पहले जाँचने लायक़ बात है।

रिकॉर्ड की नक़ल में ऐसी देनदारी दर्ज रहती है। अधिकार अभिलेख पढ़ना आ जाए तो यह जानकारी उसी काग़ज़ से निकल आती है और किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

हिस्सेदारी वाली ज़मीन

पुश्तैनी ज़मीन अक्सर कई नामों पर दर्ज रहती है। ऐसी ज़मीन का कोई एक हिस्सेदार अपना हिस्सा बेचे तो दाखिल ख़ारिज सिर्फ़ उस हिस्से का होता है, पूरी ज़मीन का नहीं।

यहाँ बँटवारा हुआ है या नहीं, यह सबसे अहम सवाल है। बँटवारा न हुआ हो तो हिस्सा काग़ज़ पर होता है, ज़मीन पर नहीं, और ख़रीदार को यह पता होना चाहिए कि वह किस चीज़ का मालिक बन रहा है।

ऑनलाइन कितना होता है

कई राज्यों में आवेदन ऑनलाइन लिया जाता है और उसकी स्थिति भी पोर्टल पर दिखती है, जो बड़ी सुविधा है क्योंकि पहले हर बार तहसील जाना पड़ता था।

पर जाँच अब भी मौक़े पर होती है और मंज़ूरी अधिकारी के स्तर से मिलती है। पूरा काम ऑनलाइन कहीं नहीं होता, और जो इसका दावा करे उससे सावधान रहिए।

नक़ल निकलवाकर जाँचिए

मंज़ूरी का संदेश आ जाने के बाद रिकॉर्ड की नई नक़ल निकालिए और उसमें अपना नाम, पिता का नाम और रकबा तीनों जाँचिए। टाइप करते समय की ग़लती इसी चरण में पकड़ में आती है।

कोई ग़लती दिखे तो उसे तुरंत सुधरवाइए, क्योंकि बाद में वह हर अगले काम में दोहराई जाती है। सुधार की प्रक्रिया खतौनी पढ़ना आ जाए तो ऐसी ग़लती ख़ुद पकड़ में आ जाती है।

ख़र्च कितना आता है

शुल्क तय होता है और आमतौर पर मामूली रहता है, क्योंकि यह एक प्रशासनिक प्रविष्टि है, कोई सौदा नहीं। राज्य के हिसाब से यह कुछ सौ रुपये तक रहता है और रसीद मिलती है।

इससे ज़्यादा माँगा जाए तो वह शुल्क नहीं है। तय दर तहसील कार्यालय में चिपकी रहती है और राज्य के राजस्व पोर्टल पर भी दी जाती है, इसलिए पहले वही देख लेना ठीक रहता है।

रसीद हर हाल में लीजिए, चाहे राशि कितनी भी छोटी हो। वही एकमात्र प्रमाण है कि आवेदन जमा हुआ, और देरी की शिकायत करते समय सबसे पहले वही माँगी जाती है। गाँव का रिकॉर्ड किस स्तर पर रखा जाता है, यह तहसील वाले पन्ने से साफ़ हो जाता है।

कितना समय लगना चाहिए

ज़्यादातर राज्यों ने इसके लिए समय सीमा तय की है, जो आमतौर पर एक से तीन महीने के बीच रहती है, बशर्ते कोई आपत्ति न आए। यह सीमा राज्य के राजस्व नियमों में लिखी रहती है।

तय समय से काफ़ी ज़्यादा लग जाए तो वह अपने आप में शिकायत का आधार है, और उसके लिए किसी नई वजह की ज़रूरत नहीं। आवेदन की रसीद पर लिखी तारीख़ ही इसका प्रमाण है, इसलिए उसे संभालकर रखना ज़रूरी है।

आपत्ति आने पर समय बढ़ जाता है और यह उचित भी है, क्योंकि सुनवाई का मौक़ा देना प्रक्रिया का हिस्सा है। पर सुनवाई की तारीख़ भी लिखित रूप से मिलनी चाहिए।

FAQs

राजस्व रिकॉर्ड में ज़मीन के मालिक का नाम बदलने की प्रक्रिया। रजिस्ट्री यह दर्ज करती है कि सौदा हुआ, दाखिल ख़ारिज यह दर्ज करता है कि ज़मीन अब किसके नाम है। दोनों अलग काम हैं।

नहीं। रजिस्ट्री उप निबंधक कार्यालय में होती है और दाखिल ख़ारिज तहसील में, और हर राज्य में एक से दूसरे को सूचना अपने आप नहीं जाती। अलग से आवेदन देना पड़ता है।

रिकॉर्ड में पुराने मालिक का नाम चलता रहेगा। लगान, किसान योजनाएँ, फ़सल बीमा और मुआवज़ा, सब उसी नाम पर बनेंगे, और बेचते समय ख़रीदार रिकॉर्ड में आपका नाम न पाकर पीछे हट सकता है।

अंग्रेज़ी में म्यूटेशन, उत्तर भारत में दाखिल ख़ारिज, और गुजरात में फेरफार। नाम अलग हैं पर प्रक्रिया लगभग एक जैसी रहती है।