लिंगानुपात एक सीधी गिनती है: प्रति एक हज़ार पुरुषों पर कितनी महिलाएँ। जनगणना 2011 में पूरे भारत का लिंगानुपात 943 दर्ज हुआ, यानी हर हज़ार पुरुषों पर 943 महिलाएँ।
गिनती कैसे होती है
तरीक़ा हर स्तर पर एक जैसा रहता है, चाहे देश का आँकड़ा निकालना हो या एक गाँव का।

बाल लिंगानुपात अलग से गिना जाता है और वही ज़्यादा बताता है, क्योंकि उसमें प्रवास का असर नहीं आता। बड़ों के आँकड़े में काम के लिए आया-गया आदमी भी जुड़ जाता है, जिससे शहरी ज़िलों का अनुपात गिरा हुआ दिखता है। बाल लिंगानुपात का मतलब अलग पन्ने पर दिया गया है।
राज्यों की तस्वीर
अंतर बहुत बड़ा है। सबसे ऊपर और सबसे नीचे के बीच चार सौ से ज़्यादा का फ़ासला है।

केरल इकलौता बड़ा राज्य है जहाँ महिलाएँ पुरुषों से ज़्यादा हैं। सूची में सबसे नीचे ज़्यादातर छोटे केंद्र शासित प्रदेश हैं, और इसकी एक बड़ी वजह काम के लिए आए पुरुषों की संख्या है, न कि वहाँ की स्थानीय आबादी का ढाँचा।
छोटी जगह के आँकड़े सावधानी माँगते हैं
गाँव के स्तर पर लिंगानुपात बहुत ऊपर-नीचे होता है। जहाँ दो सौ लोग रहते हों, वहाँ दस-बीस लोगों का फ़र्क़ भी अनुपात को सैकड़ों अंक हिला देता है। इसलिए एक गाँव का आँकड़ा अकेले पढ़ना ठीक नहीं।
गाँव कितने छोटे हो सकते हैं, यह भारत में कुल कितने गाँव हैं वाली पोस्ट से अंदाज़ा लग जाता है। तहसील या ज़िले का आँकड़ा ज़्यादा भरोसेमंद रहता है क्योंकि गिनती बड़ी होती है। सबसे अच्छे और सबसे ख़राब अनुपात वाले ज़िलों की सूची सबसे ज़्यादा लिंगानुपात वाले ज़िले वाले पन्ने पर है।
अपने ज़िले का कैसे देखें
रास्ता वही है जो बाक़ी आँकड़ों का है: राज्य चुनिए, फिर ज़िला। ज़िले के पन्ने पर लिंगानुपात, बाल लिंगानुपात, साक्षरता और आबादी एक साथ मिलते हैं, और वहीं से तहसील और गाँव तक उतरा जा सकता है।
पूरी सूची राज्यों की सूची से शुरू होती है। यह आँकड़ा जनगणना 2011 का है, इसलिए अगली जनगणना के बाद यह बदलेगा, पर तब तक सरकारी काम में यही आधार बना रहेगा।
यह आँकड़ा मायने क्यों रखता है
लिंगानुपात एक संख्या है, पर वह बहुत कुछ एक साथ बता देती है। जहाँ यह लगातार कम रहता है, वहाँ आमतौर पर बेटियों की पढ़ाई, सेहत और सुरक्षा के आँकड़े भी कमज़ोर मिलते हैं, इसलिए योजनाएँ बनाते समय इसे शुरुआती संकेत की तरह पढ़ा जाता है।
इसी वजह से केंद्र और राज्यों की कई योजनाएँ उन्हीं ज़िलों को चुनती हैं जहाँ यह अनुपात सबसे नीचे है। ज़िले का आँकड़ा देख लेना इसलिए सिर्फ़ जिज्ञासा नहीं, यह जानने का तरीक़ा भी है कि आपका इलाक़ा किन योजनाओं के दायरे में आ सकता है।
बाल लिंगानुपात ज़्यादा साफ़ तस्वीर देता है
बड़ों के अनुपात में प्रवास घुल जाता है। जहाँ काम के लिए पुरुष बाहर से आते हैं, वहाँ अनुपात गिरा दिखता है, और जहाँ से पुरुष बाहर जाते हैं, वहाँ बढ़ा हुआ। इन दोनों में से कोई भी बात वहाँ की असली स्थिति नहीं बताती।
शून्य से छह साल के बच्चों में यह गड़बड़ी नहीं होती, क्योंकि इस उम्र में कोई काम के लिए नहीं जाता। इसीलिए बाल लिंगानुपात को ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है और नीति बनाते समय उसी को देखा जाता है।
शहर और गाँव का अंतर
कई राज्यों में गाँवों का लिंगानुपात शहरों से बेहतर है। इसकी एक बड़ी वजह फिर वही है: शहरों में काम के लिए आए पुरुषों की संख्या ज़्यादा होती है, जिससे वहाँ का अनुपात नीचे खिंच जाता है।
पर यह पूरी कहानी नहीं है। कुछ समृद्ध ग्रामीण इलाक़ों में बाल लिंगानुपात ग़रीब इलाक़ों से भी कम मिला है, जो बताता है कि यह मामला सिर्फ़ आमदनी का नहीं है।
केरल और पड़ोसी राज्यों का फ़र्क़
केरल का अनुपात एक हज़ार से ऊपर है, और वह इकलौता बड़ा राज्य है जहाँ ऐसा है। इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही महिला साक्षरता, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और देर से होने वाली शादियाँ मानी जाती हैं।
दक्षिण के बाक़ी राज्य भी एक हज़ार के आसपास हैं, जबकि उत्तर-पश्चिम के कई राज्य काफ़ी नीचे। यह फ़र्क़ दशकों पुराना है और एक-दो जनगणनाओं में नहीं बदलता। साक्षरता दर के आँकड़ों में भी यही भौगोलिक पैटर्न दिखाई देता है।
छोटे केंद्र शासित प्रदेशों को अलग पढ़िए
सूची में सबसे नीचे ज़्यादातर छोटे केंद्र शासित प्रदेश हैं, और उनका आँकड़ा बड़े राज्यों के साथ सीधे तुलना करने लायक़ नहीं। वहाँ कुल आबादी कम है और कारख़ानों या निर्माण के काम के लिए आए पुरुषों का हिस्सा बहुत बड़ा।
ऐसी जगहों पर अनुपात वहाँ के समाज के बारे में कम और वहाँ की अर्थव्यवस्था के बारे में ज़्यादा बताता है। इसीलिए आँकड़ा पढ़ते समय यह देखना ज़रूरी है कि जगह कितनी बड़ी है।
अपने गाँव का आँकड़ा कैसे पढ़ें
गाँव के पन्ने पर पुरुष और महिला की गिनती अलग-अलग दी रहती है, इसलिए अनुपात ख़ुद भी निकाला जा सकता है। पर छोटे गाँव में यह संख्या बहुत हिलती है, इसलिए उसे अकेले पढ़ने के बजाय तहसील के आँकड़े के साथ रखिए।
सबसे काम की तुलना यही है: अपने गाँव का अनुपात अपनी तहसील के औसत से कितना ऊपर या नीचे है। यही तरीक़ा साक्षरता और आबादी के आँकड़ों पर भी लागू होता है।
आँकड़ा पुराना है, यह याद रखिए
यह पूरा आँकड़ा जनगणना 2011 का है। उसके बाद कई राज्यों में बाल लिंगानुपात में सुधार के संकेत मिले हैं, पर वे नमूना सर्वेक्षणों से आए हैं, पूरी गिनती से नहीं, इसलिए वे ज़िले के स्तर पर उतने पक्के नहीं होते।
अगली जनगणना के बाद ही हर गाँव और ज़िले के लिए नया पक्का आँकड़ा मिलेगा। तब तक सरकारी काम में यही आधार बना रहेगा, और तुलना करते समय दोनों तरफ़ एक ही साल का आँकड़ा रखना चाहिए।
आँकड़े को दूसरे आँकड़ों के साथ पढ़िए
अकेला लिंगानुपात अधूरी तस्वीर देता है। उसे साक्षरता दर और ख़ासकर महिला साक्षरता के साथ रखकर देखिए, क्योंकि जिन इलाक़ों में महिला साक्षरता ऊँची है, वहाँ यह अनुपात आमतौर पर बेहतर मिलता है।
तीसरी चीज़ जो साथ देखनी चाहिए वह है शहरी और ग्रामीण आबादी का हिस्सा। जिन ज़िलों में कारख़ाने या निर्माण का काम ज़्यादा है, वहाँ बाहर से आए पुरुषों की वजह से अनुपात नीचे खिंचता है, और वह वहाँ के समाज के बारे में कम बताता है।
अनुपात सुधरने में समय लगता है
लिंगानुपात एक साल में नहीं बदलता, क्योंकि वह पूरी आबादी का हिसाब है और उसमें हर उम्र के लोग शामिल हैं। किसी इलाक़े में आज सुधार शुरू हो तो भी कुल अनुपात में वह असर दिखने में एक पूरी पीढ़ी लग जाती है।
बाल लिंगानुपात इस मामले में तेज़ है। वह सिर्फ़ छह साल तक के बच्चों को गिनता है, इसलिए हाल के बदलाव उसमें पहले दिखाई देते हैं, और इसी वजह से उसे शुरुआती चेतावनी की तरह पढ़ा जाता है।
जनगणना और नमूना सर्वेक्षण
लिंगानुपात के आँकड़े दो तरह से आते हैं। जनगणना हर व्यक्ति को गिनती है, इसलिए उसका आँकड़ा गाँव के स्तर तक भरोसेमंद रहता है। नमूना सर्वेक्षण कुछ ही परिवारों से जानकारी लेते हैं, इसलिए वे देश और राज्य के स्तर पर तो ठीक हैं, पर ज़िले या गाँव के लिए उतने पक्के नहीं।
ख़बरों में अक्सर दोनों तरह के आँकड़े साथ छप जाते हैं और पाठक उन्हें एक मान लेता है। तुलना करते समय यह देख लेना चाहिए कि दोनों आँकड़े एक ही स्रोत के हैं या नहीं, वरना बदलाव असली लगेगा जबकि वह सिर्फ़ गिनती के तरीक़े का फ़र्क़ होगा।
FAQs
महिलाओं की संख्या को पुरुषों की संख्या से भाग देकर, फिर एक हज़ार से गुणा करके। नतीजा बताता है कि प्रति एक हज़ार पुरुषों पर कितनी महिलाएँ हैं।
जनगणना 2011 में यह 943 दर्ज हुआ, यानी हर एक हज़ार पुरुषों पर 943 महिलाएँ। राज्यों के बीच इसमें चार सौ से ज़्यादा का फ़ासला है।
क्योंकि उसमें प्रवास का असर नहीं आता। शून्य से छह साल के बच्चों में कोई काम के लिए बाहर नहीं जाता, इसलिए वह आँकड़ा असली स्थिति ज़्यादा साफ़ बताता है।
छोटे गाँव में नहीं। जहाँ दो सौ लोग रहते हों, वहाँ दस-बीस लोगों का फ़र्क़ भी अनुपात को सैकड़ों अंक हिला देता है। तहसील या ज़िले का आँकड़ा ज़्यादा भरोसेमंद रहता है।