यह सवाल सुनने में आसान लगता है, पर इसका जवाब इस बात पर टिका है कि आप गिन क्या रहे हैं। जनगणना 2011 की ग्राम निर्देशिका में 5,89,883 गाँव दर्ज हैं। हमारे रिकॉर्ड में भी इतने ही गाँव हैं, और हर एक का अपना पन्ना है।
इस गिनती में वे गाँव भी शामिल हैं जहाँ जनगणना के समय एक भी व्यक्ति नहीं रहता था। ऐसे गाँव काग़ज़ में मौजूद रहते हैं क्योंकि उनकी ज़मीन का राजस्व रिकॉर्ड चलता रहता है। इसी वजह से "कितने गाँव" का जवाब "कितने बसे हुए गाँव" से अलग निकलता है।
राज्यवार गिनती
गाँवों की संख्या राज्य के आकार से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहाँ ज़मीन कितने टुकड़ों में दर्ज है। उत्तर प्रदेश में एक लाख से ज़्यादा गाँव हैं, जबकि उससे बड़े राज्य राजस्थान में उसके आधे से भी कम।

ऊपर के बारह राज्यों में ही देश के आधे से ज़्यादा गाँव आ जाते हैं। पूरी सूची और हर राज्य का अपना ब्यौरा राज्यों की सूची वाले पन्ने पर मिलेगा।
गिनती का ढाँचा
हर गाँव एक तय क्रम में दर्ज होता है। ऊपर देश, फिर राज्य, फिर ज़िला, फिर तहसील, और सबसे नीचे गाँव। यही क्रम हर सरकारी पोर्टल पर चलता है, इसलिए किसी भी गाँव तक पहुँचने का रास्ता एक जैसा रहता है।

बीच वाली इकाई का नाम राज्य के हिसाब से बदलता है। कहीं उसे तहसील कहते हैं, कहीं ब्लॉक, कहीं मंडल और कहीं तालुका। तहसील का मतलब समझ लेने पर पोर्टल की शब्दावली आसान हो जाती है।
राजस्व गाँव और बसा हुआ गाँव
जनगणना जिसे गाँव गिनती है, वह असल में राजस्व गाँव है। यह ज़मीन की एक इकाई है, जिसकी सीमा राजस्व विभाग तय करता है। एक राजस्व गाँव में कई बस्तियाँ या मजरे हो सकते हैं, और वे अलग से नहीं गिने जाते।
इसीलिए गाँव की संख्या और बस्तियों की संख्या कभी एक जैसी नहीं होती। इस फ़र्क़ को राजस्व गाँव वाले पन्ने पर विस्तार से समझाया गया है।
ग्राम पंचायत अलग चीज़ है
ग्राम पंचायत एक चुनी हुई संस्था है, गाँव एक राजस्व इकाई। एक ग्राम पंचायत के नीचे अक्सर कई गाँव आते हैं, इसलिए देश में ग्राम पंचायतों की संख्या गाँवों से काफ़ी कम है। नरेगा और आवास जैसी योजनाओं में काम पंचायत के स्तर पर होता है, गाँव के स्तर पर नहीं।
यही वजह है कि नरेगा जॉब कार्ड की सूची गाँव चुनकर नहीं, पंचायत चुनकर खुलती है। पोर्टल पर यह अंतर ध्यान न रहे तो अपना नाम ढूँढ़ने में दिक़्क़त होती है।
2027 की जनगणना में क्या बदलेगा
अगली जनगणना के बाद यह संख्या बदलेगी। नए ज़िले बने हैं, कुछ गाँव शहरी सीमा में आ गए हैं, और कुछ जगह राजस्व गाँवों का बँटवारा हुआ है। तब तक 2011 की गिनती ही सरकारी काम का आधार बनी रहेगी।
जनगणना गिनती कैसे करती है
गिनती एक दिन का काम नहीं होती। उससे पहले पूरे देश का नक़्शा ब्लॉक और गणना खंडों में बाँटा जाता है, और हर खंड एक गणनाकार को सौंपा जाता है। यह तैयारी असली गिनती से महीनों पहले शुरू होती है, और इसी चरण में तय होता है कि कौन सी बस्ती किस गाँव में गिनी जाएगी।
गाँव की सीमा जनगणना ख़ुद नहीं बनाती। वह राजस्व विभाग के रिकॉर्ड से ली जाती है, जो ज़मीन के हिसाब-किताब के लिए पहले से मौजूद रहता है। इसी वजह से जनगणना का गाँव और राजस्व का गाँव एक ही चीज़ होते हैं, और दोनों की संख्या मिलती है।
हर गाँव को एक स्थायी संख्या भी दी जाती है, जिसे जनगणना कोड कहते हैं। यह कोड इसलिए बनाया गया कि एक ही नाम के सैकड़ों गाँवों को अलग-अलग पहचाना जा सके। सरकारी योजनाओं का ब्यौरा अक्सर इसी कोड पर टिका रहता है, नाम पर नहीं।
ख़ाली गाँव भी गिने जाते हैं
जनगणना 2011 में ऐसे गाँव भी दर्ज हुए जहाँ गिनती के समय कोई नहीं रहता था। ये आमतौर पर वे जगहें हैं जहाँ से लोग काम के लिए चले गए, या जो जंगल, पहाड़ और नदी के किनारे की ज़मीन हैं जिन पर बसावट कभी हुई ही नहीं।
ऐसा गाँव काग़ज़ से हटता नहीं, क्योंकि उसकी ज़मीन किसी न किसी के नाम दर्ज है और उस पर लगान बनता है। इसीलिए "कितने गाँव हैं" और "कितने गाँवों में लोग रहते हैं", ये दो अलग सवाल हैं और इनके जवाब भी अलग हैं।
गाँव कितने बड़े होते हैं
आकार में बहुत फ़र्क़ है। कुछ गाँवों की आबादी पचास से भी कम है, और कुछ में साठ हज़ार से ज़्यादा लोग रहते हैं। जो गाँव इतने बड़े हो चुके हैं, वे असल में क़स्बे जैसे हैं, पर काग़ज़ में गाँव ही दर्ज रहते हैं क्योंकि उनका प्रशासन अब भी पंचायत के पास है।
यही बात उल्टी तरफ़ भी लागू होती है। पहाड़ी और जनजातीय इलाक़ों में गाँव छोटे होते हैं, क्योंकि खेती लायक़ ज़मीन बिखरी हुई है और बस्तियाँ दूर-दूर बसती हैं। हिमाचल प्रदेश में गाँवों की संख्या उसकी आबादी के हिसाब से बहुत ज़्यादा है, और वजह यही है।
गाँव कब शहर बन जाता है
जनगणना किसी जगह को शहरी तब मानती है जब वहाँ नगर पालिका या छावनी बोर्ड जैसी संस्था हो। इसके अलावा एक दूसरी श्रेणी भी है, जिसमें बिना नगर पालिका वाली जगहें भी शहरी गिनी जाती हैं अगर वहाँ आबादी पाँच हज़ार से ऊपर हो, घनत्व तय सीमा से ज़्यादा हो, और ज़्यादातर पुरुष खेती से बाहर काम करते हों।
इन शर्तों की वजह से हर जनगणना में कुछ गाँव सूची से निकलकर शहरी सूची में चले जाते हैं। यही एक बड़ी वजह है कि गाँवों की कुल संख्या हर दस साल में थोड़ी बदलती रहती है, भले ही ज़मीन पर कुछ न बदला हो।
ग्रामीण आबादी का हिस्सा
गाँवों की संख्या के साथ यह भी देखना चाहिए कि उनमें कितने लोग रहते हैं। जनगणना 2011 में देश की दो तिहाई से ज़्यादा आबादी गाँवों में दर्ज हुई, यानी शहरीकरण के बावजूद भारत अब भी मुख्य रूप से ग्रामीण है।
राज्यों के बीच यह अनुपात बहुत अलग है। कुछ राज्यों में लगभग पूरी आबादी गाँवों में है और कुछ में आधे से ज़्यादा लोग शहरों में रहते हैं। सबसे ग्रामीण राज्य वाली सूची इस अंतर को एक जगह दिखा देती है।
यह आँकड़ा कहाँ काम आता है
गाँवों की गिनती सिर्फ़ जानकारी की बात नहीं है। केंद्र और राज्य की योजनाओं में पैसा अक्सर गाँवों और आबादी के आधार पर बँटता है, और सड़क, बिजली तथा पानी के लक्ष्य भी इन्हीं संख्याओं पर तय होते हैं।
इसीलिए पुराना आँकड़ा होते हुए भी जनगणना 2011 आज तक सरकारी काम का आधार बना हुआ है। हमारे यहाँ यह पूरा आँकड़ा किस स्रोत से आया है, यह डेटा के बारे में वाले पन्ने पर लिखा है।
गाँव का नाम और उसकी वर्तनी
रिकॉर्ड में नाम अंग्रेज़ी में लिखे गए और फिर वापस हिंदी में पढ़े गए, इसलिए एक ही गाँव कई वर्तनियों में मिलता है। रामपुर और रामपुरा, या नयागाँव और नया गाँव, काग़ज़ में अलग प्रविष्टियाँ बन जाती हैं और गिनती में दो बार नहीं, पर खोजने में उलझन ज़रूर पैदा करती हैं।
इसीलिए किसी सरकारी पोर्टल पर गाँव ढूँढ़ते समय पूरा नाम टाइप करने के बजाय शुरू के तीन-चार अक्षर डालकर सूची में से चुनना बेहतर रहता है। यही तरीक़ा ज़मीन, राशन और पेंशन, तीनों के पोर्टल पर काम करता है।
एक बात और ध्यान रखने लायक़ है। जनगणना का गाँव प्रशासन की इकाई नहीं, ज़मीन की इकाई है, इसलिए उसकी सीमा वहाँ रहने वालों की सुविधा से नहीं, पुराने राजस्व बंदोबस्त से तय हुई है। कई गाँवों की सीमा सौ साल से ज़्यादा पुरानी है और आज की बसावट से मेल नहीं खाती, फिर भी काग़ज़ में वही चलती है और हर सरकारी हिसाब उसी पर बनता है।
FAQs
जनगणना 2011 की ग्राम निर्देशिका में 5,89,883 गाँव दर्ज हैं। इनमें वे गाँव भी शामिल हैं जहाँ गिनती के समय कोई नहीं रहता था, क्योंकि उनकी ज़मीन का राजस्व रिकॉर्ड चलता रहता है।
उत्तर प्रदेश में, जहाँ एक लाख से ज़्यादा गाँव दर्ज हैं। उसके बाद मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान आते हैं। यह संख्या राज्य के आकार से नहीं, इस बात से तय होती है कि वहाँ ज़मीन कितने टुकड़ों में दर्ज है।
नहीं। एक ग्राम पंचायत के नीचे अक्सर दो से पाँच गाँव आते हैं, इसलिए देश में पंचायतों की संख्या गाँवों से काफ़ी कम है। पंचायत का नाम आमतौर पर उसके सबसे बड़े गाँव पर रखा जाता है।
अगली जनगणना के बाद। तब तक 2011 का आँकड़ा ही सरकारी काम का आधार रहेगा, भले ही इस बीच नए ज़िले बने हों और कुछ गाँव शहरी सीमा में आ गए हों।