गुजरात में ज़मीन का रिकॉर्ड दो काग़ज़ों में रहता है। खेत का ब्यौरा 7/12 में, जिसे सातबारा भी कहा जाता है, और खाते की जानकारी 8अ में। दोनों राज्य के AnyROR पोर्टल पर मिलते हैं।
रिकॉर्ड निकालने का तरीक़ा
पोर्टल पर ग्रामीण और शहरी ज़मीन के विकल्प अलग-अलग दिए गए हैं। गाँव की ज़मीन के लिए ग्रामीण वाला विकल्प चुनिए, वरना आपका गाँव सूची में मिलेगा ही नहीं।

तीसरे क़दम पर तीन रास्ते खुलते हैं: सर्वे संख्या, खाता संख्या, या मालिक का नाम। सर्वे संख्या पता हो तो वही सबसे भरोसेमंद है, क्योंकि नाम से खोजने पर एक जैसे नामों की लंबी सूची आ सकती है।
गुजरात, एक नज़र में
पोर्टल पर ज़िला, तालुका और गाँव चुनना पड़ता है, इसलिए यह जान लेना काम आता है कि राज्य कितने हिस्सों में बँटा है।

तालुका वही इकाई है जिसे उत्तर भारत में तहसील कहा जाता है, और उसके सारे गाँव एक साथ देखने का तरीक़ा अपनी तहसील के सारे गाँव कैसे देखें में दिया है। गाँव किस तालुका में आता है, यह पक्का न हो तो गुजरात के ज़िलों की सूची से ज़िला खोलकर उसकी तालुकाएँ देखी जा सकती हैं।
ऑनलाइन नक़ल कहाँ चलती है और कहाँ नहीं
यह बात बहुत लोग देर से समझते हैं। पोर्टल पर देखने के लिए जो नक़ल खुलती है, वह सिर्फ़ जानकारी के लिए है। बैंक में, अदालत में या किसी रजिस्ट्री के काम में उसे नहीं माना जाता।
क़ानूनी काम के लिए digitally signed प्रति या तालुका कार्यालय से प्रमाणित नक़ल लगती है, जिस पर शुल्क देना पड़ता है। मुफ़्त वाली नक़ल से यह जाँच ज़रूर हो जाती है कि रिकॉर्ड में नाम और रकबा सही दर्ज है या नहीं।
रिकॉर्ड में नाम ग़लत हो तो
सुधार ऑनलाइन नहीं होता। तालुका या मामलतदार कार्यालय में आवेदन देना पड़ता है, और साथ में सही नाम वाला दस्तावेज़ लगाना होता है। रजिस्ट्री के बाद नए मालिक का नाम अपने आप नहीं चढ़ता, उसके लिए दाखिल ख़ारिज करानी होती है।
दाखिल ख़ारिज हुए बिना रिकॉर्ड में पुराना नाम ही दिखता रहेगा, चाहे रजिस्ट्री कितनी भी पुरानी हो। दूसरे राज्यों के पोर्टल और वहाँ की शब्दावली ज़मीन के रिकॉर्ड वाले हिस्से में राज्यवार दी गई है।
7/12 में क्या-क्या लिखा होता है
यह नाम दो रजिस्टरों से आया है, गाँव के फ़ॉर्म 7 और फ़ॉर्म 12, जिन्हें एक ही काग़ज़ पर छाप दिया जाता है। ऊपर वाला हिस्सा बताता है कि ज़मीन किसके नाम है, और नीचे वाला बताता है कि उस पर क्या उगाया गया।
ऊपर वाले हिस्से में सर्वे संख्या, कुल रकबा, मालिक या मालिकों के नाम, और ज़मीन का प्रकार दर्ज रहता है। अगर ज़मीन पर बैंक का क़र्ज़ है या कोई और दावा है, तो वह भी यहीं दिखता है, और ख़रीदने से पहले यही हिस्सा सबसे ध्यान से पढ़ा जाता है।
नीचे वाले हिस्से में साल दर साल की फ़सल दर्ज होती है। यह खेती के ऋण और मुआवज़े के दावों में काम आता है, क्योंकि उसी से साबित होता है कि ज़मीन पर सचमुच खेती हो रही थी।
8अ क्या है और कब चाहिए
7/12 एक ज़मीन के टुकड़े का ब्यौरा है, जबकि 8अ एक व्यक्ति का। इसमें वह सारी ज़मीन एक साथ दिखती है जो उस गाँव में उस खातेदार के नाम दर्ज है, चाहे वह कई अलग-अलग सर्वे संख्याओं में फैली हो।
इसीलिए बैंक से ऋण लेते समय या पूरी जोत का हिसाब देते समय 8अ माँगा जाता है, और किसी एक खेत का मामला हो तो 7/12। दोनों एक-दूसरे की जगह नहीं लेते।
नोंध और फेरफार
रिकॉर्ड में कोई भी बदलाव सीधे नहीं होता। पहले उसकी एक प्रविष्टि दर्ज होती है, जिसे गुजरात में नोंध कहते हैं, और फिर मंज़ूरी के बाद वह 7/12 में चढ़ता है। इस पूरी प्रक्रिया को फेरफार कहा जाता है।
नोंध दर्ज होने और मंज़ूर होने के बीच समय लगता है, और इसी दौरान आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। ज़मीन ख़रीदते समय यह देखना ज़रूरी है कि कोई नोंध लंबित तो नहीं, क्योंकि वह बाद में मालिकाना बदल सकती है।
दूसरे राज्यों में इसी काम को दाखिल ख़ारिज या म्यूटेशन कहते हैं। नाम अलग हैं, प्रक्रिया लगभग एक जैसी है, और म्यूटेशन वाला पन्ना उसे संक्षेप में समझाता है।
ई-धारा और रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण
गुजरात ने ज़मीन के रिकॉर्ड को काफ़ी पहले कंप्यूटर पर लाना शुरू किया था, और इसी काम को ई-धारा कहा गया। पहले हर नक़ल हाथ से लिखी जाती थी और तलाटी के पास जाना पड़ता था; अब वही रिकॉर्ड पोर्टल पर खुल जाता है।
डिजिटल होने का एक नतीजा यह भी है कि पुराने काग़ज़ और नए रिकॉर्ड में कभी-कभी फ़र्क़ निकलता है। टाइप करते समय नाम या रकबा ग़लत दर्ज हो गया हो, तो सुधार के लिए आवेदन देना पड़ता है और पुराना काग़ज़ सबूत के तौर पर लगाना होता है।
शहरी ज़मीन का रिकॉर्ड अलग है
पोर्टल पर ग्रामीण और शहरी के दो अलग विकल्प इसीलिए हैं। शहरी इलाक़ों में ज़मीन सर्वे संख्या से नहीं, संपत्ति कार्ड और सिटी सर्वे नंबर से दर्ज होती है, और वह रिकॉर्ड अलग विभाग रखता है।
गाँव के जो हिस्से नगर पालिका में शामिल हो गए हैं, वहाँ यह उलझन सबसे ज़्यादा होती है। ऐसी ज़मीन का पुराना 7/12 मौजूद रहता है पर मौजूदा रिकॉर्ड शहरी सूची में चला जाता है।
नक़ल निकालने से पहले क्या तैयार रखें
तीन में से कोई एक चीज़ चाहिए: सर्वे संख्या, खाता संख्या, या मालिक का पूरा नाम। सर्वे संख्या सबसे सटीक है क्योंकि वह एक ही ज़मीन को बताती है, जबकि नाम से खोजने पर एक जैसे नामों की लंबी सूची आ सकती है।
गाँव का नाम भी वही डालिए जो सरकारी रिकॉर्ड में है, क्योंकि बोलचाल का नाम और दर्ज नाम अलग हो सकते हैं। सही वर्तनी तालुका की गाँव सूची से मिल जाती है।
ज़मीन ख़रीदने से पहले क्या देखें
सिर्फ़ यह देख लेना काफ़ी नहीं कि रिकॉर्ड में बेचने वाले का नाम है। साथ में यह भी जाँचिए कि ज़मीन पर कोई क़र्ज़ या दावा दर्ज तो नहीं, और कोई नोंध लंबित तो नहीं, क्योंकि लंबित नोंध बाद में मालिकाना बदल सकती है।
ज़मीन का प्रकार भी देखिए। खेती की ज़मीन पर ग़ैर-खेती का काम करने के लिए अलग से मंज़ूरी लेनी पड़ती है, और कुछ श्रेणियों की ज़मीन बिना सरकारी अनुमति बेची ही नहीं जा सकती। यह सब 7/12 के ऊपरी हिस्से में लिखा रहता है।
तलाटी और मामलतदार, काम किसका
गाँव के स्तर पर रिकॉर्ड तलाटी रखता है, जिसे दूसरे राज्यों में पटवारी या लेखपाल कहा जाता है। रोज़ की प्रविष्टियाँ, फ़सल की नोंध और छोटी-मोटी जाँच उसी के ज़िम्मे रहती है, इसलिए पहला सवाल वहीं पूछा जाता है।
मंज़ूरी का काम तालुका स्तर पर मामलतदार के पास जाता है। नाम बदलने, बँटवारे या ज़मीन के प्रकार से जुड़ा कोई भी बदलाव उसी की मंज़ूरी से रिकॉर्ड में चढ़ता है, और विवाद होने पर सुनवाई भी वहीं से शुरू होती है।
संयुक्त मालिकाना और बँटवारा
बहुत सी ज़मीन एक नाम पर नहीं, कई हिस्सेदारों के नाम पर दर्ज रहती है, ख़ासकर पुश्तैनी ज़मीन में। ऐसे में 7/12 पर सारे नाम एक साथ दिखते हैं और हर एक का हिस्सा अलग लिखा रहता है।
बँटवारा होने पर हर हिस्से को अलग सर्वे संख्या मिलती है, जिसे हिस्सा नंबर कहते हैं। यह प्रक्रिया अपने आप नहीं होती, उसके लिए आवेदन देना पड़ता है, और जब तक वह पूरी न हो, काग़ज़ में ज़मीन साझा ही रहती है चाहे ज़मीन पर मेड़ खिंच चुकी हो।
FAQs
7/12 एक ज़मीन के टुकड़े का ब्यौरा है, जिसमें सर्वे संख्या, रकबा, मालिक और फ़सल दर्ज रहती है। 8अ एक खातेदार का ब्यौरा है, जिसमें उस गाँव की उसकी सारी ज़मीन एक साथ दिखती है।
नहीं। पोर्टल पर देखने के लिए खुलने वाली नक़ल सिर्फ़ जानकारी के लिए है। क़ानूनी काम के लिए digitally signed प्रति या तालुका कार्यालय से प्रमाणित नक़ल लगती है।
रिकॉर्ड में कोई बदलाव पहले एक प्रविष्टि के रूप में दर्ज होता है, जिसे नोंध कहते हैं, और मंज़ूरी के बाद वह 7/12 में चढ़ता है। पूरी प्रक्रिया फेरफार कहलाती है, जिसे दूसरे राज्यों में दाखिल ख़ारिज कहा जाता है।
सुधार ऑनलाइन नहीं होता। तालुका या मामलतदार कार्यालय में आवेदन देना पड़ता है और साथ में सही नाम वाला दस्तावेज़ लगाना होता है।