जॉब कार्ड की सूची देखने के लिए न कोई login चाहिए, न कोई शुल्क। पूरा रिकॉर्ड नरेगा के सरकारी पोर्टल पर खुला रखा गया है। दिक़्क़त सिर्फ़ यह है कि विकल्पों के नाम अंग्रेज़ी में हैं और क्रम याद न हो तो आदमी भटक जाता है।
पाँच क़दम
क्रम हर राज्य के लिए एक जैसा रहता है। एक भी क़दम छोड़ देने पर अगला विकल्प खुलता ही नहीं, इसलिए इन्हें इसी क्रम में कीजिए।

चौथे क़दम पर विकल्प का नाम अंग्रेज़ी में Job Card / Employment Register लिखा मिलेगा। यही वह जगह है जहाँ पंचायत के सारे जॉब कार्ड धारकों के नाम एक साथ आते हैं। अपने राज्य का सीधा पन्ना नरेगा जॉब कार्ड वाले हिस्से से खोला जा सकता है।
क़ानून आपको क्या देता है
जॉब कार्ड सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं है, वह एक हक़ का सबूत है। मनरेगा अधिनियम 2005 के तहत हर ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक काम करने को तैयार हों, साल में सौ दिन काम की गारंटी है।

इन समय सीमाओं का महत्व तब पता चलता है जब काम या पैसा रुक जाए। पंद्रह दिन में काम न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता बनता है, और मस्टर रोल बंद होने के पंद्रह दिन के भीतर मज़दूरी खाते में आ जानी चाहिए।
नाम सूची में न दिखे तो
सबसे पहले वित्तीय वर्ष जाँचिए। सूची हर साल अलग बनती है, और पिछले साल काम किया हो तो नाम उसी साल की सूची में मिलेगा, चालू साल में नहीं। यह सबसे आम ग़लती है।
दूसरी वजह पंचायत के नाम की वर्तनी होती है। कई जगह पोर्टल पर नाम थोड़ा अलग लिखा है, इसलिए मिलते-जुलते नाम भी देखिए। सही वर्ष और सही पंचायत में भी नाम न हो, तो ग्राम रोज़गार सेवक से मिलकर नया आवेदन दीजिए।
काम किया पर भुगतान नहीं आया
पोर्टल पर मस्टर रोल देखिए कि हाज़िरी दर्ज है या नहीं। हाज़िरी दर्ज न हो तो मामला पंचायत स्तर का है। हाज़िरी दर्ज है और फिर भी पैसा नहीं आया, तो गड़बड़ी खाते में है: या तो खाता संख्या ग़लत दर्ज है, या आधार से जुड़ाव अधूरा है।
हल न मिले तो शिकायत का क्रम तय है। पहले ग्राम रोज़गार सेवक और पंचायत सचिव, फिर ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी, फिर ज़िला कार्यक्रम समन्वयक। हर चरण पर लिखित आवेदन दीजिए और उसकी रसीद लीजिए।
पंचायत, गाँव और ब्लॉक का फ़र्क़
पोर्टल पर आपको ब्लॉक और ग्राम पंचायत चुननी होती है, गाँव नहीं। एक पंचायत में कई गाँव आते हैं, और एक ब्लॉक में कई पंचायतें। अपने गाँव की तहसील और ज़िला पता हो तो पंचायत ढूँढ़ना आसान रहता है, और वह ब्यौरा राज्यों की सूची से निकाला जा सकता है।
देश भर में कितने गाँव और कितनी पंचायतें हैं, इसका ब्यौरा भारत में कुल कितने गाँव हैं वाली पोस्ट में है। ब्लॉक को हर राज्य में एक ही नाम से नहीं जाना जाता। बिहार और झारखंड में उसे प्रखंड कहते हैं, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनपद पंचायत, तेलंगाना में मंडल। पोर्टल पर लिखा Block ही मिलेगा, पर आपके काग़ज़ों में वही दूसरे नाम से दर्ज होगा।
जॉब कार्ड कैसे बनवाएँ
आवेदन ग्राम पंचायत में दिया जाता है, किसी दफ़्तर के चक्कर लगाने की ज़रूरत नहीं। कोई भी ग्रामीण परिवार, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक काम करने को तैयार हों, जॉब कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसमें आमदनी या ज़मीन की कोई शर्त नहीं है।
आवेदन के साथ परिवार के हर वयस्क सदस्य का आधार, एक पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो, और बैंक या डाकघर की पासबुक लगती है। कार्ड परिवार के नाम पर बनता है, व्यक्ति के नाम पर नहीं, और उस पर परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के नाम दर्ज होते हैं।
आवेदन देते समय रसीद ज़रूर लीजिए। क़ानून के मुताबिक़ कार्ड पंद्रह दिन के भीतर मिल जाना चाहिए, और रसीद ही वह काग़ज़ है जिससे देरी साबित होती है।
काम माँगना अलग बात है
यह वह हिस्सा है जो सबसे ज़्यादा लोग चूक जाते हैं। जॉब कार्ड बन जाने का मतलब यह नहीं कि काम अपने आप मिलेगा। काम के लिए अलग से लिखित आवेदन देना पड़ता है, जिसमें यह लिखा होता है कि आपको कब से और कितने दिन काम चाहिए।
इसी लिखित आवेदन से पंद्रह दिन की गिनती शुरू होती है। अगर उसके बाद काम नहीं मिला, तो बेरोज़गारी भत्ता बनता है, जो राज्य सरकार को देना होता है। बिना लिखित आवेदन के यह दावा नहीं बनता, इसलिए मौखिक कहकर छोड़ देना ठीक नहीं।
मस्टर रोल क्या होता है
मस्टर रोल उस काम की हाज़िरी का सरकारी रजिस्टर है। हर काम के लिए एक मस्टर रोल खुलता है, उसका अपना नंबर होता है, और उसी पर रोज़ की हाज़िरी दर्ज होती है। काम पूरा होने पर वह बंद कर दिया जाता है और उसी के आधार पर मज़दूरी बनती है।
मस्टर रोल पोर्टल पर भी दिखता है, इसलिए यह जाँचा जा सकता है कि आपकी हाज़िरी दर्ज हुई या नहीं। भुगतान में गड़बड़ी की जाँच यहीं से शुरू होनी चाहिए, क्योंकि हाज़िरी दर्ज न हो तो पैसा बनेगा ही नहीं।
मज़दूरी कैसे आती है
पैसा हाथ में नहीं मिलता। वह सीधे बैंक या डाकघर के खाते में भेजा जाता है, और खाता उसी व्यक्ति का होना चाहिए जिसका नाम जॉब कार्ड में है। इसी वजह से खाता बंद हो जाने, आधार से जुड़ाव अधूरा रहने या खाता संख्या ग़लत दर्ज होने पर भुगतान अटक जाता है।
मज़दूरी की दर हर राज्य के लिए अलग तय होती है और हर साल बदलती है। वह केंद्र सरकार अधिसूचित करती है, इसलिए पड़ोसी राज्य की दर से अपनी दर मिलाकर देखना ठीक नहीं रहता।
किस तरह के काम होते हैं
काम की सूची क़ानून में दी गई है और उसका मक़सद ऐसी चीज़ें बनाना है जो गाँव में टिकें। इसमें तालाब और कुएँ की खुदाई, नहर और नाली, गाँव की सड़क, पौधारोपण, और ज़मीन को खेती लायक़ बनाने का काम आता है।
कुछ काम निजी ज़मीन पर भी हो सकते हैं, जैसे छोटे किसानों के खेत में मेड़बंदी या कुआँ। ऐसे काम के लिए पात्रता की अलग शर्तें रहती हैं और मंज़ूरी ग्राम सभा से लेनी होती है।
ग्राम सभा और सामाजिक अंकेक्षण
कौन सा काम होगा, यह अधिकारी अकेले तय नहीं करते। कामों की सूची ग्राम सभा में रखी जाती है और वहीं से प्राथमिकता तय होती है। इसीलिए ग्राम सभा की बैठक में जाना इस योजना में असर डालने का सबसे सीधा रास्ता है।
ख़र्च की जाँच भी गाँव में ही होती है, जिसे सामाजिक अंकेक्षण कहा जाता है। इसमें रिकॉर्ड सबके सामने पढ़कर सुनाया जाता है और मज़दूर बता सकते हैं कि काम सचमुच हुआ या नहीं। इसकी शुरुआत राजस्थान के गाँवों से हुई थी और अब यह क़ानून का हिस्सा है।
सौ दिन की गिनती परिवार की होती है
सौ दिन एक परिवार के लिए हैं, हर सदस्य के लिए अलग नहीं। अगर परिवार के दो लोग पचास-पचास दिन काम करते हैं तो कोटा पूरा हो गया। यह बात अक्सर बाद में पता चलती है, जब काम माँगने पर मना कर दिया जाता है।
अधिसूचित सूखा या आपदा वाले इलाक़ों में यह सीमा बढ़ाई जा सकती है, और वन अधिकार वाले कुछ परिवारों के लिए अलग प्रावधान है। ये बदलाव हर साल एक जैसे नहीं रहते, इसलिए अपने राज्य की मौजूदा स्थिति ब्लॉक कार्यालय से पूछ लेना बेहतर है।
जॉब कार्ड संभालकर रखिए
जॉब कार्ड में काम के दिन और मिली मज़दूरी दर्ज होती रहती है, इसलिए वह सिर्फ़ पहचान का काग़ज़ नहीं, आपका अपना रिकॉर्ड भी है। पोर्टल का ब्यौरा और कार्ड का ब्यौरा मेल न खाए तो यही कार्ड सबसे पहला सबूत बनता है।
कार्ड मज़दूर के पास रहना चाहिए, किसी बिचौलिए या ठेकेदार के पास नहीं। कार्ड अपने पास न होने की शिकायतें आम हैं, और यह अपने आप में एक गड़बड़ी है जिसकी शिकायत ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी से की जा सकती है।
FAQs
कुछ नहीं, न login न शुल्क। बस अपना राज्य, ज़िला, ब्लॉक और ग्राम पंचायत पता होनी चाहिए। सूची नरेगा के सरकारी पोर्टल पर सबके लिए खुली रहती है।
वित्तीय वर्ष। सूची हर साल अलग बनती है, और पिछले साल किया गया काम उसी साल की सूची में दिखेगा, चालू साल में नहीं। यही सबसे आम ग़लती है।
पूरे परिवार के लिए। अगर परिवार के दो लोग पचास-पचास दिन काम कर लें तो कोटा पूरा माना जाएगा। यह बात अक्सर तब पता चलती है जब आगे काम माँगने पर मना कर दिया जाता है।
लिखित आवेदन देने के पंद्रह दिन के भीतर काम न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता बनता है, जो राज्य सरकार देती है। बिना लिखित आवेदन और रसीद के यह दावा साबित नहीं होता।