बिहार में ज़मीन के दो रिकॉर्ड चलते हैं और दोनों के नाम अलग हैं। खतियान वह पुराना अभिलेख है जो सर्वे के समय बना था और यह बताता है कि उस समय ज़मीन किसके नाम थी। जमाबंदी मौजूदा रिकॉर्ड है, जिसमें आज का मालिक और लगान दर्ज रहता है।

दोनों की ज़रूरत अलग-अलग मौक़ों पर पड़ती है। ख़रीद-बिक्री और योजनाओं में जमाबंदी चलती है, जबकि पुश्तैनी दावे में खतियान सबसे मज़बूत काग़ज़ माना जाता है। दोनों एक ही पोर्टल से निकलते हैं, और यह पन्ना उसी का रास्ता बताता है। हमारे रिकॉर्ड में बिहार के 38 ज़िले, 542 प्रखंड और 43,593 गाँव दर्ज हैं।

बिहार भूमि: जमाबंदी और खतियान कैसे देखें

पोर्टल कौन सा है

बिहार का land record पोर्टल biharbhumi.bihar.gov.in है। इसे राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग चलाता है और इस पर देखने के पैसे नहीं लगते। मिलते-जुलते नाम वाली निजी साइटें बहुत हैं, इसलिए पता देखकर ही खोलिए।

घर पर कई विकल्प एक साथ दिखते हैं, और यही शुरुआत में उलझाता है। तीन काम के विकल्प ये हैं: जमाबंदी पंजी देखें, भू-अभिलेख यानी खतियान देखें, और लगान जमा करें या रसीद देखें। बाक़ी विकल्प दाखिल ख़ारिज और परिमार्जन जैसे आवेदनों के लिए हैं।

जमाबंदी पंजी कैसे खोलें

जमाबंदी पंजी वाला विकल्प चुनने पर पहले ज़िला और अंचल माँगा जाता है। अंचल वही है जिसे आम बोलचाल में प्रखंड या ब्लॉक कहते हैं, और उसी के नीचे हलका आता है। हलका पटवारी के क्षेत्र जैसा है, और उसके नीचे मौज़ा यानी गाँव।

गाँव चुनने के बाद खोजने के कई तरीक़े मिलते हैं: भाग और पृष्ठ संख्या से, खाता संख्या से, प्लॉट संख्या से, या रैयत यानी मालिक के नाम से। जिनके पास कोई संख्या नहीं है, वे नाम से खोज सकते हैं, पर नाम एक जैसे बहुत होते हैं इसलिए पिता के नाम से मिलान ज़रूर कीजिए।

खतियान अलग विकल्प से मिलता है

खतियान देखने का रास्ता अलग है और उसमें ज़िला, अंचल, मौज़ा चुनने के बाद खाता या खेसरा संख्या माँगी जाती है। बिहार में खेत की संख्या को खेसरा कहते हैं, जो उत्तर प्रदेश के खसरा जैसा ही होता है।

खतियान पुराने सर्वे का काग़ज़ है, इसलिए उसमें जो नाम है वह आज का मालिक नहीं भी हो सकता। यही बात लोग सबसे ज़्यादा भूलते हैं और खतियान दिखाकर मान लेते हैं कि रिकॉर्ड उनके नाम है। आज का नाम जमाबंदी में देखा जाता है, खतियान में नहीं।

बिहार भूमि: जमाबंदी और खतियान कैसे देखें

बिहार का खेसरा वही काम करता है जो उत्तर प्रदेश का खसरा करता है, पर वहाँ मौजूदा रिकॉर्ड को खतौनी कहा जाता है, जमाबंदी नहीं। दोनों राज्यों का ढाँचा मिलाकर देखना हो तो UP भूलेख से खतौनी निकालने वाला तरीक़ा देखिए।

जमाबंदी में क्या-क्या लिखा रहता है

जमाबंदी खुलने पर सबसे ऊपर रैयत का नाम और पिता का नाम रहता है। उसके नीचे खाता, खेसरा और रकबा आता है, और अंत में लगान की राशि। लगान वाली पंक्ति यह भी दिखाती है कि आख़िरी बार कब तक का भुगतान दर्ज है।

रकबा बिहार में डिसमिल और एकड़ में लिखा मिलता है, कहीं-कहीं कट्ठा में भी। यह इलाक़े के हिसाब से बदलता है, इसलिए किसी और राज्य के हिसाब से गिनती मत कीजिए। जोतने वाले का नाम अलग हो सकता है और मालिक का अलग, यह भी जमाबंदी में साफ़ दिखता है।

लगान रसीद ऑनलाइन कटती है

बिहार में लगान जमा करना और उसकी रसीद निकालना दोनों इसी पोर्टल से होता है। इसके लिए जमाबंदी संख्या चाहिए, जो जमाबंदी पंजी खोलने पर सबसे ऊपर लिखी रहती है।

रसीद संभालकर रखिए। ज़मीन के मामलों में यह सबसे आसानी से मिलने वाला सबूत है कि रिकॉर्ड में आपका नाम चल रहा है, और कई आवेदनों में इसी की माँग होती है। पुरानी रसीदें भी काम आती हैं क्योंकि वे लगातार क़ब्ज़े का सिलसिला दिखाती हैं।

जो ग़लतियाँ सबसे ज़्यादा मिलती हैं

सबसे आम ग़लती नाम की वर्तनी की है, क्योंकि पुराने हाथ से लिखे रजिस्टर से टाइप करते समय अक्षर बदल जाना आम था। दूसरे नंबर पर पिता के नाम की ग़लती आती है, और तीसरे पर रकबा, जो बँटवारे के बाद ठीक से दर्ज न होने पर रह जाता है।

कुछ जमाबंदियों में एक ही खेसरा दो लोगों के नाम चढ़ा मिलता है, जो सबसे उलझी स्थिति है। ऐसे मामले में खेसरा संख्या के साथ पुराना खतियान लगाना पड़ता है, क्योंकि नाम से पहचान मुश्किल हो जाती है।

जमाबंदी में ग़लती हो तो परिमार्जन

बिहार में जमाबंदी की ग़लती सुधारने की अपनी व्यवस्था है, जिसे परिमार्जन कहते हैं। नाम की वर्तनी, पिता का नाम, रकबा, खेसरा संख्या या लगान की राशि, इनमें से कुछ भी ग़लत हो तो इसी रास्ते से ठीक होता है।

आवेदन ऑनलाइन दिया जाता है और उसके साथ वह काग़ज़ लगाना पड़ता है जिसमें सही जानकारी दर्ज है, जैसे पुरानी रसीद, केवाला या खतियान। आवेदन अंचल कार्यालय में जाता है और वहीं से मंज़ूरी मिलती है, इसलिए जाँच के लिए बुलाए जाने पर जाना पड़ता है।

दाखिल ख़ारिज अलग काम है

परिमार्जन ग़लती सुधारता है। नाम बदलना, यानी ख़रीद या विरासत के बाद रिकॉर्ड में नया मालिक चढ़ाना, उससे अलग काम है और उसे दाखिल ख़ारिज कहते हैं। दोनों को एक समझ लेने से महीनों बर्बाद होते हैं।

बिहार में दाखिल ख़ारिज का आवेदन और उसकी स्थिति, दोनों इसी पोर्टल पर हैं। पूरी प्रक्रिया, काग़ज़ और समय-सीमा दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में दी है।

सर्वे के दौरान क्या बदलता है

राज्य में नए सिरे से भूमि सर्वे चल रहा है, और जिन अंचलों में यह चल रहा है वहाँ लोगों से पुराने काग़ज़ माँगे जाते हैं। इसमें खतियान, केवाला, लगान रसीद और वंशावली शामिल रहती है।

इसीलिए पुराने काग़ज़ अभी सबसे ज़्यादा काम के हैं। जिनके पास खतियान नहीं है, वे पोर्टल से उसकी नक़ल निकालकर रख सकते हैं, और वही सर्वे में जमा की जा सकती है। वंशावली पंचायत से बनती है और उसमें समय लगता है, इसलिए वह पहले से करा लेना बेहतर है।

भू नक्शा अलग पोर्टल पर है

जमाबंदी यह नहीं बताती कि खेत गाँव में कहाँ पड़ता है और उसका आकार कैसा है। उसके लिए नक़्शा चाहिए, जो बिहार में अलग पोर्टल पर रखा गया है। वहाँ ज़िला, अंचल और मौज़ा चुनने के बाद खेसरा संख्या पर क्लिक करने से उस टुकड़े का ब्यौरा खुलता है।

नक़्शा और जमाबंदी मिलाकर देखना ज़रूरी है, ख़ासकर ख़रीदते समय। काग़ज़ पर रकबा सही होने के बावजूद टुकड़ा उस जगह न होना आम शिकायत है, और यह बात सिर्फ़ नक़्शे से पकड़ में आती है।

ऑनलाइन नक़ल कहाँ चलती है और कहाँ नहीं

पोर्टल से निकली साधारण नक़ल देखने और अपने पास रखने के लिए है। किसी सरकारी आवेदन, बैंक या अदालत में वही प्रति चलती है जिस पर विभाग की डिजिटल मुहर हो।

इसलिए काम के हिसाब से तय कीजिए कि कौन सी प्रति चाहिए। जहाँ सिर्फ़ जानकारी चाहिए वहाँ मुफ़्त नक़ल काफ़ी है, और जहाँ काग़ज़ जमा करना है वहाँ प्रमाणित प्रति निकलवाइए।

मोबाइल पर देखते समय

पोर्टल मोबाइल पर खुल जाता है, पर जमाबंदी तालिका चौड़ी होती है और स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाती है। लगान और रकबे वाले ख़ाने अक्सर उसी कटे हिस्से में रहते हैं।

फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। दूसरी बात, दोपहर से पहले सर्वर व्यस्त रहता है क्योंकि अंचल कार्यालयों का काम उसी समय चलता है; पन्ना न खुले तो बाद में देखिए।

अपने गाँव और प्रखंड का ब्यौरा

पोर्टल पर अंचल और मौज़ा सही चुनना आधा काम है, क्योंकि एक ही नाम के गाँव कई प्रखंडों में मिलते हैं। हमारे पास बिहार के हर ज़िले के प्रखंड और उनके गाँव दर्ज हैं, जनसंख्या और पिन कोड के साथ।

अपना गाँव किस प्रखंड में आता है, यह बिहार के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है। राज्य के पोर्टल और उसके नियमों का ब्यौरा बिहार के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।

याद रखने लायक़ बातें

खतियान और जमाबंदी एक चीज़ नहीं हैं, और किसी सौदे में जमाबंदी ही देखी जाती है। पोर्टल पर देखना मुफ़्त है और किसी बिचौलिए की ज़रूरत नहीं पड़ती।

साल में एक बार अपनी जमाबंदी और लगान की स्थिति देख लेना अच्छा रहता है। ग़लती जितनी जल्दी पकड़ी जाए, परिमार्जन उतनी ही आसानी से हो जाता है।

FAQs

खतियान पुराने सर्वे का अभिलेख है और बताता है कि उस समय ज़मीन किसके नाम थी। जमाबंदी मौजूदा रिकॉर्ड है, जिसमें आज का मालिक और लगान दर्ज रहता है। किसी सौदे में जमाबंदी ही देखी जाती है।

बिहार में इसके लिए परिमार्जन की व्यवस्था है। आवेदन ऑनलाइन दिया जाता है और उसके साथ वह काग़ज़ लगाना पड़ता है जिसमें सही जानकारी दर्ज है, जैसे पुरानी रसीद, केवाला या खतियान।

पोर्टल पर भू-लगान वाले विकल्प से, जिसके लिए जमाबंदी संख्या चाहिए। वह संख्या जमाबंदी पंजी खोलने पर सबसे ऊपर लिखी रहती है। रसीद संभालकर रखिए, कई आवेदनों में उसी की माँग होती है।

आम तौर पर खतियान, केवाला, लगान रसीद और वंशावली माँगी जाती है। वंशावली पंचायत से बनती है और उसमें समय लगता है, इसलिए उसे पहले से बनवा लेना बेहतर रहता है।