मनरेगा में सबसे कम इस्तेमाल होने वाला हक़ यही है। क़ानून कहता है कि काम माँगने के पंद्रह दिन के भीतर काम न मिले तो बेरोज़गारी भत्ता बनता है, और वह राज्य सरकार को देना होता है।

ज़्यादातर लोग यह दावा कभी नहीं करते, और वजह तकनीकी है। भत्ता काम न मिलने से नहीं बनता, लिखित रूप से काम माँगने और फिर न मिलने से बनता है। जिसने मौखिक माँगा, उसका दावा काग़ज़ पर मौजूद ही नहीं होता।

पहला और सबसे ज़रूरी क़दम

काम की माँग लिखकर दीजिए। एक सादे काग़ज़ पर अपना नाम, जॉब कार्ड संख्या, कितने दिन काम चाहिए और कब से चाहिए, इतना लिखना काफ़ी है।

नरेगा में बेरोज़गारी भत्ता कैसे माँगें

इसे ग्राम पंचायत में जमा कीजिए और रसीद लीजिए। रसीद पर तारीख़ होनी चाहिए, क्योंकि पंद्रह दिन की गिनती उसी तारीख़ से शुरू होती है। रसीद देने से मना नहीं किया जा सकता।

पंद्रह दिन की गिनती

गिनती आवेदन की तारीख़ से होती है, काम शुरू होने की तारीख़ से नहीं। अगर आपने पंद्रह दिन बाद की तारीख़ से काम माँगा है, तो गिनती उस तारीख़ से शुरू होगी।

इस अवधि में काम मिल गया तो भत्ते का सवाल नहीं रहता। काम न मिला, या मिला पर बहुत देर से मिला, तो बीच के दिनों का भत्ता बनता है।

भत्ता कितना होता है

यह मज़दूरी दर से जुड़ा होता है और पूरी मज़दूरी के बराबर नहीं होता। क़ानून में पहले तीस दिन के लिए एक दर और उसके बाद के लिए दूसरी दर तय की गई है, और सटीक राशि हर राज्य की मज़दूरी दर पर निर्भर करती है।

नरेगा में बेरोज़गारी भत्ता कैसे माँगें

चूँकि मज़दूरी दर हर साल बदलती है, मौजूदा राशि अपने ब्लॉक कार्यालय से पूछ लेना ठीक रहता है। अपने राज्य का नरेगा पन्ना नरेगा जॉब कार्ड वाले हिस्से से खुलता है।

दावा कैसे करें

पंद्रह दिन बीत जाने पर ग्राम पंचायत में लिखित दावा दीजिए, जिसमें काम माँगने की तारीख़, रसीद संख्या और यह बात लिखी हो कि तय अवधि में काम नहीं मिला।

दावा पंचायत से ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी तक जाता है, और भुगतान का आदेश वहीं से बनता है। भत्ता भी उसी बैंक खाते में आता है जिसमें मज़दूरी आती है।

काम देने से मना क्यों किया जाता है

सबसे आम जवाब यह मिलता है कि अभी कोई काम स्वीकृत नहीं है। पर यह क़ानूनी बचाव नहीं है, क्योंकि काम की सूची पहले से तैयार रखनी होती है ताकि माँग आते ही काम खोला जा सके।

दूसरा आम जवाब यह होता है कि सौ दिन पूरे हो गए। यह सही बचाव है, पर ध्यान रखिए कि सौ दिन पूरे परिवार के लिए होते हैं, हर सदस्य के लिए अलग नहीं।

रसीद न मिले तो

यह सबसे आम अड़चन है। रसीद देने से मना किया जाए, तो आवेदन डाक से भेजिए और डाक की रसीद संभालिए। पंजीकृत डाक की रसीद उतनी ही मान्य है।

दूसरा रास्ता यह है कि आवेदन ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी के कार्यालय में जमा किया जाए, क्योंकि माँग पंचायत और ब्लॉक, दोनों जगह दी जा सकती है।

शिकायत का क्रम

पहले ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी, फिर ज़िला कार्यक्रम समन्वयक, जो आमतौर पर ज़िलाधिकारी होते हैं। हर राज्य में एक लोकपाल भी नियुक्त होता है जो मनरेगा की शिकायतें सुनता है।

सामाजिक अंकेक्षण की बैठक भी इसे दर्ज कराने की जगह है, क्योंकि वहाँ उठाई गई बात कार्रवाई रिपोर्ट में लिखी जाती है। जॉब कार्ड के ब्यौरे में गड़बड़ी हो तो उसे पहले ठीक कराना बेहतर है, जिसका तरीक़ा जॉब कार्ड वाली पोस्ट में है।

काम माँगने का फ़ॉर्म कैसा होता है

कोई ख़ास छपा हुआ फ़ॉर्म ज़रूरी नहीं। सादे काग़ज़ पर लिखा आवेदन भी उतना ही मान्य है, और क़ानून में यही व्यवस्था है ताकि फ़ॉर्म न मिलने का बहाना न बने।

कई पंचायतों में छपे हुए फ़ॉर्म रखे रहते हैं और कुछ राज्यों में यह ऑनलाइन भी भरा जा सकता है। जो भी तरीक़ा हो, दो बातें ज़रूरी हैं: तारीख़ और रसीद।

एक साथ कई लोग माँगें तो बेहतर

अकेले आवेदन देने पर अक्सर यह कहकर टाल दिया जाता है कि एक आदमी के लिए काम नहीं खोला जा सकता। यह बात व्यावहारिक रूप से सही है, क्योंकि काम एक समूह के लिए खोला जाता है।

इसलिए गाँव के कई परिवार एक साथ लिखित माँग दें तो काम खुलने की संभावना कहीं ज़्यादा रहती है, और टालना मुश्किल हो जाता है। हर परिवार का आवेदन अलग होना चाहिए, भले सब एक दिन जमा हों।

काम पाँच किलोमीटर से दूर हो तो

काम आमतौर पर गाँव के पाँच किलोमीटर के भीतर दिया जाना चाहिए। इससे दूर काम दिया जाए तो अतिरिक्त भत्ते का प्रावधान है, क्योंकि आने-जाने में समय और ख़र्च दोनों लगते हैं।

दूर का काम मिलने पर उसे मना भी किया जा सकता है, पर ध्यान रहे कि मना करने पर उस बार का दावा कमज़ोर पड़ जाता है। इसलिए दूरी की बात लिखकर दर्ज कराना बेहतर रहता है।

काम मिला पर देर से मिला

यह सबसे कम समझा जाने वाला हिस्सा है। भत्ता सिर्फ़ तब नहीं बनता जब काम बिल्कुल न मिले। अगर काम पंद्रह दिन बाद मिला, तो पंद्रहवें दिन से काम शुरू होने तक के दिनों का भत्ता बनता है।

इसलिए काम मिल जाने के बाद भी दावा किया जा सकता है, बशर्ते आवेदन की तारीख़ और काम शुरू होने की तारीख़, दोनों काग़ज़ पर हों। यही वह जगह है जहाँ रसीद सबसे ज़्यादा काम आती है।

भत्ता कहाँ से आता है

मज़दूरी का पैसा केंद्र से आता है, पर बेरोज़गारी भत्ता राज्य सरकार को अपने बजट से देना होता है। यही वजह है कि इसे देने में हिचक ज़्यादा रहती है और दावे को टालने की कोशिश होती है।

यह जानना दावेदार के काम का है, क्योंकि इससे साफ़ हो जाता है कि दबाव किस स्तर पर डालना है। ब्लॉक कार्यालय की भूमिका यहाँ केंद्रीय है, और अपने राज्य का ब्यौरा नरेगा वाले हिस्से में मिलेगा।

जॉब कार्ड का ब्यौरा सही होना चाहिए

दावा करने से पहले यह जाँच लीजिए कि जॉब कार्ड में आपका नाम, उम्र और बैंक खाता सही दर्ज हैं। भत्ता उसी खाते में आता है जिसमें मज़दूरी आती है।

कुछ भी ग़लत हो तो पहले उसे ठीक कराइए, वरना मंज़ूर हुआ भत्ता भी लौट आएगा। सुधार का तरीक़ा जॉब कार्ड में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में है।

रिकॉर्ड अपने पास रखिए

इस पूरी प्रक्रिया में काग़ज़ ही सब कुछ है। काम माँगने का आवेदन, उसकी रसीद, दावे की प्रति, और हर शिकायत की रसीद, सब एक जगह संभालकर रखिए।

मामला महीनों खिंच सकता है और तब तक अधिकारी बदल चुके होते हैं। ऐसे में पुरानी तारीख़ वाली रसीद ही वह चीज़ है जो आपका दावा ज़िंदा रखती है, क्योंकि पंद्रह दिन की गिनती उसी से होती है।

यह बात पूरे गाँव के काम की है, इसलिए पंचायत की बैठक में उठाना सबसे असरदार रहता है। एक अकेला दावा टाला जा सकता है, दस परिवारों का एक साथ नहीं। राज्यों की सूची से अपनी पंचायत और ब्लॉक का सही नाम पक्का कर लीजिए, क्योंकि आवेदन में वही लिखना पड़ता है।

दावा ठुकरा दिया जाए तो

ठुकराने का कारण लिखित रूप से माँगिए। बिना कारण बताए दावा ख़ारिज नहीं किया जा सकता, और लिखित कारण मिल जाने पर आगे अपील करना आसान हो जाता है।

सबसे आम कारण यह बताया जाता है कि आपको काम की पेशकश की गई थी और आपने मना कर दिया। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए कि पेशकश कब और कैसे की गई थी।

दूसरा आम कारण यह होता है कि आवेदन पंचायत के रजिस्टर में दर्ज ही नहीं हुआ। यही वह जगह है जहाँ आपकी रसीद सब कुछ तय कर देती है।

FAQs

लिखित रूप से काम माँगने के पंद्रह दिन के भीतर काम न मिलने पर। गिनती आवेदन की तारीख़ से शुरू होती है, इसलिए रसीद पर तारीख़ होना ज़रूरी है।

नहीं। भत्ता काम न मिलने से नहीं, लिखित रूप से काम माँगने और फिर न मिलने से बनता है। मौखिक माँग का कोई काग़ज़ी निशान नहीं होता, इसलिए दावा ही नहीं बनता।

हाँ। अगर काम पंद्रह दिन के बाद मिला, तो पंद्रहवें दिन से काम शुरू होने तक के दिनों का भत्ता बनता है। इसके लिए आवेदन और काम शुरू होने, दोनों की तारीख़ काग़ज़ पर चाहिए।

आवेदन पंजीकृत डाक से भेजिए और डाक की रसीद संभालिए, वह उतनी ही मान्य है। माँग ब्लॉक कार्यक्रम अधिकारी के कार्यालय में भी जमा की जा सकती है।