महाराष्ट्र में ज़मीन का रिकॉर्ड 7/12 उतारा कहलाता है, जिसे आम बोलचाल में सातबारा कहते हैं। नाम दो सरकारी फ़ॉर्म से बना है: गाँव नमूना 7 में यह दर्ज रहता है कि ज़मीन किसके नाम है, और गाँव नमूना 12 में यह कि उस पर क्या बोया गया। दोनों एक ही काग़ज़ पर छपते हैं, इसलिए 7/12।
दूसरा ज़रूरी काग़ज़ 8अ है, जिसमें एक खातेदार की गाँव भर की ज़मीन का सार रहता है। दोनों राज्य के पोर्टल पर मुफ़्त देखे जा सकते हैं। हमारे रिकॉर्ड में महाराष्ट्र के 35 ज़िले, 329 तहसीलें और 39,491 गाँव दर्ज हैं।

पोर्टल और पहला क़दम
राज्य का land record पोर्टल bhulekh.mahabhumi.gov.in है। पहली स्क्रीन पर ही वह चीज़ माँगी जाती है जो बाक़ी राज्यों में नहीं होती: विभाग।
महाराष्ट्र राजस्व के हिसाब से छह विभागों में बँटा है, और ज़िलों की सूची विभाग चुनने के बाद ही खुलती है। अपना विभाग न पता हो तो एक-एक करके देखिए, ज़िले का नाम जिसमें मिले वही आपका विभाग है। यह एक क़दम शुरू में सबसे ज़्यादा लोगों को रोकता है।
ज़िला, तालुका, गाँव
विभाग के बाद ज़िला, फिर तालुका, फिर गाँव चुना जाता है। महाराष्ट्र में तहसील को तालुका कहते हैं, और वह वही इकाई है जिसे बाक़ी राज्यों में तहसील कहा जाता है।
गाँव की सूची राजस्व रिकॉर्ड की वर्तनी में होती है, जो बोलचाल के नाम से थोड़ी अलग हो सकती है। अपना गाँव किस तालुका में आता है यह महाराष्ट्र के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है, और वहीं से सही वर्तनी भी मिल जाती है।
खोजने के तरीक़े
गाँव चुनने के बाद पोर्टल कई विकल्प देता है। सर्वे नंबर या गट नंबर से खोजना सबसे सीधा है, क्योंकि वह हर टुकड़े के लिए अलग होता है।
नाम से भी खोजा जा सकता है, पर वहाँ नाम तीन हिस्सों में माँगा जाता है: पहला नाम, बीच का नाम और आख़िरी नाम। रिकॉर्ड में जिस क्रम से दर्ज है उसी क्रम में डालना पड़ता है, वरना कुछ नहीं मिलता। यही वजह है कि नाम से खोज अक्सर असफल होती है जबकि रिकॉर्ड मौजूद रहता है।

उतारे में क्या-क्या लिखा रहता है
उतारे के ऊपरी हिस्से में गाँव, तालुका और ज़िला रहता है, और साथ में भूमापन क्रमांक यानी सर्वे नंबर। उसके नीचे ज़मीन का क्षेत्रफल और वह श्रेणी आती है जो बताती है कि ज़मीन खेती की है या किसी और काम की।
बीच के हिस्से में भोगवटादार यानी क़ाबिज़ मालिक का नाम आता है। नीचे इतर अधिकार वाला ख़ाना होता है, और यही सबसे ध्यान से पढ़ने लायक़ है, क्योंकि उसी में बैंक का बोझ, किसी और का हक़, या अदालत का आदेश दर्ज होता है।
भोगवटादार वर्ग एक और दो
उतारे में यह भी लिखा रहता है कि ज़मीन वर्ग एक की है या वर्ग दो की। वर्ग एक वाली ज़मीन पर मालिक का पूरा हक़ होता है और वह बिना अनुमति बेची जा सकती है।
वर्ग दो वाली ज़मीन सरकार ने किसी शर्त के साथ दी होती है, जैसे पुनर्वास या आदिवासी ज़मीन के मामलों में, और उसे बेचने के लिए कलेक्टर की अनुमति लगती है। ख़रीदने से पहले यह पंक्ति देख लेना सबसे ज़रूरी काम है, क्योंकि यह चूक बाद में सौदे को ही रद्द करा देती है।
पीक पाहणी यानी फ़सल का ब्यौरा
उतारे का बारहवाला हिस्सा हर साल की फ़सल दिखाता है: किस मौसम में क्या बोया गया और कितने क्षेत्र में। यह ब्यौरा तलाठी दर्ज करता है।
मुआवज़ा, फ़सल बीमा और कई योजनाओं में यही हिस्सा देखा जाता है, नाम वाला नहीं। अब कई जगह किसान ख़ुद अपने मोबाइल से फ़सल दर्ज करते हैं, और वही प्रविष्टि आगे उतारे में चढ़ती है, इसलिए हर मौसम में उसे समय पर दर्ज करना ज़रूरी है।
गुजरात में भी यही दो काग़ज़ चलते हैं, 7/12 और 8अ, पर पोर्टल अलग है और वहाँ विभाग नहीं चुनना पड़ता। उसका रास्ता गुजरात भूलेख वाली पोस्ट में है।
8अ क्या है और कब चाहिए
7/12 एक सर्वे नंबर का ब्यौरा देता है। 8अ पूरे गाँव में उस खातेदार के नाम दर्ज सारी ज़मीन एक जगह दिखाता है, खाता क्रमांक के साथ।
बैंक से क़र्ज़ लेते समय, या यह साबित करते समय कि गाँव में आपके नाम कितनी ज़मीन है, 8अ ही माँगा जाता है। दोनों काग़ज़ एक ही पोर्टल पर अलग-अलग विकल्पों में मिलते हैं।
डिजिटल हस्ताक्षरित उतारा
पोर्टल पर जो उतारा मुफ़्त खुलता है, उस पर साफ़ लिखा रहता है कि वह केवल जानकारी के लिए है। बैंक, अदालत और सरकारी आवेदनों में वह नहीं चलता।
वहाँ डिजिटल हस्ताक्षरित उतारा लगता है, जो अलग व्यवस्था से मिलता है। उसके लिए खाता बनाना पड़ता है और तय शुल्क देना पड़ता है। मिलने वाली फ़ाइल पर सत्यापन संख्या रहती है, जिससे कोई भी उसकी जाँच कर सकता है।
फेरफार और नाम चढ़ाने की प्रक्रिया
महाराष्ट्र में नाम बदलने की प्रक्रिया को फेरफार कहते हैं। ख़रीद, विरासत या बँटवारे के बाद यह अलग से करानी पड़ती है, रजिस्ट्री से यह अपने आप नहीं होता।
फेरफार दर्ज होने के बाद एक अवधि आपत्ति के लिए रखी जाती है और फिर मंडल अधिकारी उसे मंज़ूर करते हैं। पूरी प्रक्रिया और उसमें लगने वाले काग़ज़ दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में दिए हैं, नाम भले अलग हो, क़दम वही रहते हैं।
तलाठी और मंडल अधिकारी
गाँव का रिकॉर्ड तलाठी के पास रहता है, जो वही काम करता है जो उत्तर भारत में पटवारी करता है। छोटी ग़लती का आवेदन सबसे पहले उसी के पास जाता है।
तलाठी की रिपोर्ट के बाद फ़ाइल मंडल अधिकारी के पास जाती है और मंज़ूरी वहीं से मिलती है। इसीलिए आवेदन देते समय रसीद लेना ज़रूरी है, वही आगे शिकायत में काम आती है।
ग़लती दिखे तो
नाम की वर्तनी, क्षेत्रफल या इतर अधिकार वाले ख़ाने में कुछ ग़लत दर्ज हो तो सुधार तलाठी कार्यालय से शुरू होता है। साथ में वह काग़ज़ लगाइए जिसमें सही जानकारी दर्ज है।
जहाँ किसी और का दावा भी उसी ज़मीन पर हो, वहाँ मामला सीधा सुधार नहीं रह जाता। दोनों स्थितियों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।
मोबाइल पर देखते समय
उतारा चौड़े फ़ॉर्म के रूप में बनता है और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाता है। इतर अधिकार वाला ख़ाना अक्सर उसी कटे हिस्से में रहता है, जो सबसे ज़रूरी हिस्सा है।
फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। फ़सल दर्ज करने की अवधि में पोर्टल सबसे व्यस्त रहता है, क्योंकि पूरे राज्य के किसान उन्हीं दिनों उसे खोलते हैं।
गट नंबर और सर्वे नंबर का फ़र्क़
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में चकबंदी हो चुकी है, और वहाँ पुराने सर्वे नंबर की जगह गट नंबर चलता है। एक गट में पुराने कई सर्वे नंबर समा जाते हैं।
इसीलिए पुराने काग़ज़ पर लिखा सर्वे नंबर पोर्टल पर न मिलने का मतलब यह नहीं कि ज़मीन का रिकॉर्ड ग़ायब है। ऐसे में गट नंबर से खोजना पड़ता है, और दोनों का मिलान तलाठी कार्यालय में मौजूद रहता है।
फेरफार की सूचना आती है
फेरफार दर्ज होने पर उससे जुड़े लोगों को सूचना भेजी जाती है, ताकि किसी को आपत्ति हो तो वह समय पर सामने आ सके। पता पुराना दर्ज हो तो यह सूचना नहीं पहुँचती।
इसलिए रिकॉर्ड में अपना पता और मोबाइल नंबर सही रखना उतना ही ज़रूरी है जितना नाम। यही चूक कई विवादों की जड़ बनती है, क्योंकि आपत्ति की अवधि चुपचाप निकल जाती है।
याद रखने लायक़ बातें
सातबारा दो फ़ॉर्म मिलकर बनता है, इसलिए उसमें मालिकाना और फ़सल, दोनों की जानकारी रहती है। ख़रीदते समय वर्ग और इतर अधिकार, ये दो पंक्तियाँ सबसे ज़रूरी हैं।
देखना मुफ़्त है और हस्ताक्षरित प्रति के पैसे लगते हैं। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा महाराष्ट्र के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।
FAQs
यह दो सरकारी फ़ॉर्म मिलकर बना काग़ज़ है। गाँव नमूना 7 में दर्ज रहता है कि ज़मीन किसके नाम है, और गाँव नमूना 12 में यह कि उस पर क्या बोया गया। इसे सातबारा भी कहते हैं।
महाराष्ट्र राजस्व के हिसाब से छह विभागों में बँटा है, और ज़िलों की सूची विभाग चुनने के बाद ही खुलती है। अपना विभाग न पता हो तो एक-एक करके देखिए, ज़िले का नाम जिसमें मिले वही आपका विभाग है।
इसका मतलब है कि ज़मीन किसी शर्त के साथ दी गई है और उसे बेचने के लिए अनुमति लगती है। ख़रीदने से पहले यह पंक्ति देखना ज़रूरी है, क्योंकि यह चूक बाद में सौदे को रद्द करा देती है।
8अ में गाँव भर में उस खातेदार के नाम दर्ज सारी ज़मीन एक जगह दिखती है। बैंक से क़र्ज़ लेते समय या कुल जोत दिखाते समय यही माँगा जाता है।