कर्नाटक में ज़मीन का रिकॉर्ड RTC कहलाता है, और इसे पहाणी भी कहते हैं। पूरा नाम अंग्रेज़ी में रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स, टेनेंसी ऐंड क्रॉप्स है, यानी एक ही काग़ज़ में तीन बातें: ज़मीन किसकी है, उस पर काश्त कौन करता है, और उसमें क्या बोया गया।
यह काग़ज़ राज्य के Bhoomi पोर्टल पर मुफ़्त देखा जा सकता है। यह पन्ना वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बताता है, और RTC में लिखी उन बातों का मतलब भी, जो दूसरे राज्यों के रिकॉर्ड में नहीं मिलतीं। हमारे रिकॉर्ड में कर्नाटक के 30 ज़िले, 171 तालुक और 27,816 गाँव दर्ज हैं।

पोर्टल और पहला क़दम
राज्य का land record पोर्टल landrecords.karnataka.gov.in है, जिसे राजस्व विभाग चलाता है। इसी व्यवस्था को भूमि कहा जाता है, इसलिए दोनों नाम एक ही चीज़ के लिए मिलते हैं।
वहाँ "View RTC and MR" यानी RTC और म्यूटेशन रिकॉर्ड देखने वाला विकल्प सबसे काम का है। यह बिना किसी खाते के खुल जाता है और उसके लिए कोई शुल्क नहीं लगता।
ज़िला, तालुक, होबली, गाँव
कर्नाटक में गाँव तक पहुँचने के लिए चार चुनाव करने पड़ते हैं और उनमें से एक बाक़ी राज्यों में नहीं मिलता। ज़िला और तालुक के बाद होबली माँगा जाता है, और उसके बाद गाँव।
होबली तालुक के भीतर की एक इकाई है, जिसमें आस-पास के कई गाँव आते हैं। अपने गाँव का होबली ज़्यादातर लोगों को याद नहीं रहता, और यहीं खोज रुक जाती है। होबली की सूची छोटी होती है, इसलिए एक-एक करके खोलकर अपने गाँव का नाम ढूँढ़ा जा सकता है।
सर्वे नंबर, सुर्नोक और हिस्सा
गाँव चुनने के बाद सर्वे नंबर माँगा जाता है, और उसके साथ दो और ख़ाने आते हैं जो नए लोगों को उलझाते हैं: सुर्नोक और हिस्सा।
सर्वे नंबर पूरे टुकड़े का नंबर है। हिस्सा उसका वह भाग है जो बँटवारे के बाद बना, और सुर्नोक उस भाग की उप-पहचान है। पुराने काग़ज़ पर अक्सर तीनों लिखे रहते हैं, एक के बाद एक। तीनों सही डालने पर ही सही RTC खुलता है, वरना उसी सर्वे नंबर का दूसरा हिस्सा सामने आ जाता है।

RTC में क्या-क्या लिखा रहता है
ऊपर गाँव, होबली, तालुक और ज़िला रहता है, और साथ में सर्वे नंबर। उसके नीचे ज़मीन का क्षेत्रफल एकड़ और गुंटा में दिया जाता है, जो कर्नाटक की अपनी इकाई है।
बीच में मालिक का नाम और खाता संख्या आती है। उसके बाद ज़मीन की क़िस्म, यानी खुश्की, तरी या बागायत, जिससे पता चलता है कि खेती बारिश पर निर्भर है, सिंचित है, या बाग़ वाली ज़मीन है। सबसे नीचे फ़सल का ब्यौरा हर मौसम के हिसाब से दर्ज रहता है।
महाराष्ट्र के सातबारा में यही जानकारी इतर अधिकार वाले ख़ाने में आती है। दोनों राज्यों के काग़ज़ मिलाकर देखने हों तो 7/12 उतारे वाली पोस्ट काम आएगी।
ऋण वाला ख़ाना ध्यान से पढ़िए
RTC में एक ख़ाना उन बोझों का रहता है जो ज़मीन पर दर्ज हैं, जैसे बैंक का क़र्ज़ या किसी और का हक़। ख़रीदने से पहले यही हिस्सा सबसे ज़रूरी है।
यह ख़ाना ख़ाली होने का मतलब है कि रिकॉर्ड में कोई बोझ दर्ज नहीं है। कुछ लिखा मिले तो सौदे से पहले उसका निपटारा ज़रूरी है, वरना बोझ ज़मीन के साथ नए मालिक तक चला आता है।
म्यूटेशन रिकॉर्ड अलग से दिखता है
कर्नाटक में नाम बदलने की प्रक्रिया म्यूटेशन कहलाती है और उसका अपना नंबर होता है, जिसे MR कहते हैं। पोर्टल पर RTC के साथ ही म्यूटेशन का ब्यौरा भी देखा जा सकता है।
इससे यह पता चलता है कि ज़मीन किस-किस के नाम से होकर आज यहाँ पहुँची है। ख़रीदते समय यह सिलसिला देख लेना चाहिए; पूरी प्रक्रिया दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में समझाई है, नाम अलग है पर क़दम वही रहते हैं।
मुफ़्त नक़ल और हस्ताक्षरित प्रति
पोर्टल पर जो RTC मुफ़्त खुलता है, वह देखने और अपने पास रखने के लिए है। बैंक, अदालत या सरकारी आवेदन में वही प्रति चलती है जिस पर डिजिटल हस्ताक्षर हो।
हस्ताक्षरित प्रति के लिए तय शुल्क लगता है और वह नागरिक सेवा केंद्रों से भी मिल जाती है। मिलने वाली फ़ाइल पर सत्यापन संख्या छपी रहती है, जिससे कोई भी उसकी जाँच कर सकता है।
नक़्शा और सीमा
RTC यह नहीं बताता कि टुकड़ा गाँव में कहाँ है और उसकी सीमा कहाँ तक जाती है। उसके लिए नक़्शा चाहिए, जो राज्य ने अलग व्यवस्था में रखा है और मोबाइल पर भी देखा जा सकता है।
सीमा को लेकर विवाद हो तो नक़्शा ही पहला काग़ज़ है जिससे बात शुरू होती है। ज़्यादा उलझे मामलों में नए सिरे से नाप कराई जाती है, जिसके लिए तालुक कार्यालय में आवेदन देना पड़ता है।
ग़लती दिखे तो
नाम की वर्तनी, क्षेत्रफल या फ़सल का ब्यौरा ग़लत दर्ज हो तो सुधार का आवेदन तालुक कार्यालय में दिया जाता है। साथ में वह काग़ज़ लगाइए जिसमें सही जानकारी दर्ज है।
अगर कोई और भी उसी सर्वे नंबर पर हक़ जता रहा है, तो यह सुधार का नहीं, विवाद का मामला बन जाता है। दोनों स्थितियों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।
फ़सल का ब्यौरा हर मौसम बदलता है
RTC का फ़सल वाला हिस्सा हर मौसम में नए सिरे से दर्ज होता है, इसलिए वह पुराना भी दिख सकता है। यह ग़लती नहीं है, बस प्रविष्टि अभी चढ़ी नहीं होती।
मुआवज़ा और बीमा के दावों में यही हिस्सा देखा जाता है, मालिकाना वाला नहीं। इसलिए बुवाई के बाद यह देख लेना चाहिए कि उस मौसम की फ़सल दर्ज हुई या नहीं।
पोडी यानी बँटवारे के बाद का रिकॉर्ड
ज़मीन बँटने के बाद हर हिस्से का अपना रिकॉर्ड बनवाना पड़ता है, और कर्नाटक में इस प्रक्रिया को पोडी कहते हैं। इसके बिना बँटवारा काग़ज़ पर तो हो जाता है, पर RTC में हिस्सा अलग नहीं दिखता।
यही वजह है कि कई परिवारों में बँटवारे के वर्षों बाद भी सारी ज़मीन एक ही सर्वे नंबर पर सबके नाम दर्ज मिलती है। बेचते समय यह अड़चन बनती है, क्योंकि ख़रीदार को साफ़ हिस्सा चाहिए होता है।
नागरिक सेवा केंद्र से भी नक़ल मिलती है
जिनके पास इंटरनेट नहीं है, वे तालुक के नागरिक सेवा केंद्र से भी RTC निकलवा सकते हैं। वहाँ तय शुल्क लगता है और रसीद मिलती है।
रसीद ज़रूर लीजिए, क्योंकि शुल्क तय है और उससे ज़्यादा माँगने की शिकायत उसी के आधार पर होती है। घर से देखना हमेशा मुफ़्त रहता है, इसलिए सिर्फ़ देखने के लिए केंद्र जाने की ज़रूरत नहीं।
मोबाइल पर देखते समय
RTC चौड़े फ़ॉर्म के रूप में बनता है और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाता है। ऋण और फ़सल वाले ख़ाने अक्सर उसी कटे हिस्से में रहते हैं।
फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। फ़सल का ब्यौरा चढ़ने के दिनों में पोर्टल पर भार बढ़ जाता है, इसलिए पन्ना न खुले तो थोड़ी देर बाद देखिए।
अपने गाँव और तालुक का ब्यौरा
होबली और गाँव सही चुनना आधा काम है, क्योंकि एक ही नाम के गाँव कई तालुकों में मिलते हैं। हमारे पास कर्नाटक के हर ज़िले के तालुक और उनके गाँव दर्ज हैं, जनसंख्या और पिन कोड के साथ।
अपना गाँव किस तालुक में आता है, यह कर्नाटक के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा कर्नाटक के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।
याद रखने लायक़ बातें
सर्वे नंबर के साथ हिस्सा और सुर्नोक सही डालना कर्नाटक में सबसे ज़रूरी बात है। ख़रीदते समय ऋण वाला ख़ाना और म्यूटेशन का सिलसिला, ये दो चीज़ें ज़रूर देखिए।
पोर्टल पर पढ़ना मुफ़्त है, और शुल्क तभी लगता है जब प्रति कहीं जमा करनी हो। साल में एक बार अपना RTC देख लेना अच्छी आदत है, ख़ासकर बँटवारे या बिक्री के बाद।
FAQs
हाँ। कर्नाटक में ज़मीन के रिकॉर्ड को दोनों नामों से जाना जाता है। उसमें मालिकाना, काश्तकारी और फ़सल, तीनों की जानकारी एक साथ रहती है।
सर्वे नंबर पूरे टुकड़े का है, हिस्सा उसका वह भाग है जो बँटवारे के बाद बना, और सुर्नोक उस भाग की उप-पहचान। तीनों सही डालने पर ही सही RTC खुलता है।
उसमें वे बोझ दर्ज रहते हैं जो ज़मीन पर हैं, जैसे बैंक का क़र्ज़। बोझ ज़मीन के साथ नए मालिक तक चला आता है, इसलिए सौदे से पहले उसका निपटारा ज़रूरी है।
बँटवारे के बाद हर हिस्से का अलग रिकॉर्ड बनवाने की प्रक्रिया को पोडी कहते हैं। इसके बिना RTC में सबका नाम एक ही सर्वे नंबर पर चलता रहता है, जो बेचते समय अड़चन बनता है।