जम्मू और कश्मीर में ज़मीन का रिकॉर्ड उसी ढाँचे पर चलता है जो पंजाब और हरियाणा में मिलता है। मालिकाना जमाबंदी में दर्ज रहता है, और खेत में उस मौसम क्या बोया गया यह गिरदावरी में। दोनों अलग काग़ज़ हैं और दोनों की ज़रूरत अलग मौक़ों पर पड़ती है।

राज्य ने इन्हें ऑनलाइन देखने की व्यवस्था की है, इसलिए नक़ल देखने भर के लिए तहसील जाना ज़रूरी नहीं रह गया। यह पन्ना वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बताता है और रिकॉर्ड की शब्दावली भी समझाता है। हमारे जनगणना रिकॉर्ड में जम्मू और कश्मीर की 23 ज़िला इकाइयाँ, 82 तहसीलें और 6,649 गाँव दर्ज हैं।

जम्मू कश्मीर: जमाबंदी और गिरदावरी कैसे देखें

पोर्टल कौन सा है

ज़मीन का रिकॉर्ड देखने के लिए प्रशासन का पोर्टल landrecords.jk.gov.in है। इसी व्यवस्था को "आपकी ज़मीन आपकी निगरानी" नाम से भी जाना जाता है, इसलिए दोनों नाम एक ही चीज़ के लिए मिलते हैं।

वहाँ ज़िला, तहसील और गाँव चुनकर रिकॉर्ड खोला जाता है। देखने के पैसे नहीं लगते, पर प्रमाणित नक़ल तहसील या नामित केंद्र से ही मिलती है।

ज़िला, तहसील, गाँव

पहले ज़िला चुनिए, फिर तहसील, और उसके बाद गाँव की सूची खुलेगी। नाम राजस्व रिकॉर्ड की वर्तनी में होते हैं, जो बोलचाल से थोड़े अलग हो सकते हैं।

पहाड़ी इलाक़ों में एक ही नाम के गाँव पास-पास मिलते हैं, इसलिए तहसील सही चुनना ज़रूरी है। अपना गाँव किस तहसील में आता है यह जम्मू और कश्मीर के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है।

खेवट, खतौनी और खसरा

यहाँ की शब्दावली बाक़ी राज्यों से अलग है और यही शुरुआत में उलझाती है। खेवट मालिक का नंबर है, खतौनी उस व्यक्ति का नंबर है जो ज़मीन जोतता है, और खसरा खेत के टुकड़े का नंबर।

एक खेवट के नीचे कई खतौनियाँ और कई खसरे आ सकते हैं। इसलिए किसी से नक़ल माँगते समय यह बताना पड़ता है कि आपके पास कौन सी संख्या है। जमाबंदी का ढाँचा समझ लेने पर तीनों का रिश्ता साफ़ हो जाता है।

जम्मू कश्मीर: जमाबंदी और गिरदावरी कैसे देखें

जमाबंदी में क्या दर्ज रहता है

जमाबंदी में मालिक का नाम, पिता का नाम, खेवट और खतौनी संख्या, खसरा संख्या और रकबा आता है। साथ में यह भी कि ज़मीन पर कोई बोझ या अधिकार दर्ज है या नहीं।

रकबा यहाँ कनाल और मरला में लिखा मिलता है, जो इस क्षेत्र की अपनी इकाइयाँ हैं। किसी और राज्य के हिसाब से गिनती करने पर आँकड़ा ग़लत बैठता है, इसलिए इकाई देखकर ही समझिए।

राजस्थान में भी रिकॉर्ड जमाबंदी कहलाता है और वहाँ भी वह समय-समय पर नए सिरे से लिखी जाती है, पर रकबे की इकाई अलग है। वह व्यवस्था अपना खाता वाली पोस्ट में दी है।

जमाबंदी हर कुछ साल में नई बनती है

यह रिकॉर्ड स्थायी नहीं होता। हर कुछ वर्ष बाद जमाबंदी नए सिरे से लिखी जाती है, और उसमें बीच के सारे बदलाव शामिल कर लिए जाते हैं।

इसीलिए नक़ल के ऊपर लिखा वर्ष देखना ज़रूरी है। किसी सौदे या आवेदन में नवीनतम जमाबंदी लगती है, जबकि पुराना दावा साबित करने में पुरानी वाली सबसे काम आती है।

गिरदावरी फ़सल का रिकॉर्ड है

गिरदावरी हर मौसम में पटवारी मौक़े पर जाकर दर्ज करता है: खेत में क्या बोया गया, कितने क्षेत्र में, और जोतने वाला कौन है।

मुआवज़ा, फ़सल बीमा और कई योजनाओं में यही काग़ज़ देखा जाता है, जमाबंदी नहीं। बाढ़, ओलावृष्टि या बर्फ़बारी से नुक़सान के दावों में गिरदावरी ही आधार बनती है, इसलिए हर मौसम में उसका सही दर्ज होना जाँच लेना चाहिए।

फर्द क्या है

जमाबंदी की जो नक़ल निकलती है उसे इस क्षेत्र में फर्द कहते हैं। बैंक से क़र्ज़, ज़मीन की बिक्री और कई सरकारी आवेदनों में यही माँगी जाती है।

पोर्टल पर दिखने वाली नक़ल जानकारी के लिए है। जहाँ काग़ज़ जमा करना हो वहाँ पटवारी या तहसील से जारी फर्द लगती है, जिस पर मुहर और हस्ताक्षर होते हैं।

इंतक़ाल यानी नाम बदलना

ख़रीद, विरासत या बँटवारे के बाद रिकॉर्ड में नाम बदलने की प्रक्रिया को इंतक़ाल कहते हैं, जिसे बाक़ी राज्यों में म्यूटेशन या दाखिल ख़ारिज कहा जाता है।

यह रजिस्ट्री से अलग काम है और अपने आप नहीं होता। पूरी प्रक्रिया, लगने वाले काग़ज़ और समय-सीमा दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में दी है; नाम अलग है, क़दम वही रहते हैं।

ग़लती दिखे तो

नाम की वर्तनी, पिता का नाम या रकबा ग़लत दर्ज हो तो सुधार का आवेदन तहसील में दिया जाता है। पटवारी के पास गाँव का मूल रिकॉर्ड रहता है और जाँच वहीं से शुरू होती है।

जहाँ किसी और का दावा भी उसी ज़मीन पर हो, वहाँ मामला सीधा सुधार नहीं रहता। दोनों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।

पुराने काग़ज़ सबसे काम के हैं

पहाड़ी इलाक़ों में ज़मीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटी होती है और पुश्तैनी हिस्सेदारी लंबी चलती है। ऐसे में पुरानी जमाबंदी और पुराने इंतक़ाल के काग़ज़ सबसे मज़बूत सबूत बनते हैं।

डिजिटल रिकॉर्ड में आई ग़लती अक्सर तभी पकड़ में आती है जब उसकी तुलना पुराने काग़ज़ से की जाए। इसीलिए वे काग़ज़ फेंकने नहीं चाहिए, चाहे कितने ही पुराने हों।

तत्तीमा यानी बँटे हुए टुकड़े का नक़्शा

जब एक खसरा बँटकर कई हिस्सों में बँट जाता है, तो हर हिस्से का अलग नक़्शा बनता है जिसे तत्तीमा कहते हैं। मूल नक़्शे में वह बँटवारा नहीं दिखता।

ज़मीन ख़रीदते समय तत्तीमा ज़रूर देखिए, क्योंकि जमाबंदी में रकबा तो सही दिखेगा पर टुकड़ा कहाँ है यह सिर्फ़ उसी से पता चलता है। तत्तीमा पटवारी के पास रहता है और उसकी नक़ल तहसील से मिलती है।

ज़मीन की इकाइयाँ यहाँ अलग हैं

रकबा यहाँ कनाल और मरला में लिखा जाता है। बीस मरला का एक कनाल होता है, और आठ कनाल का एक एकड़।

बोलचाल में लोग एकड़ या बीघे में बात करते हैं, जबकि काग़ज़ पर कनाल-मरला दर्ज रहता है। सौदा करते समय यह बदलाव साफ़ कर लीजिए, क्योंकि इसी में सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी होती है।

ऑनलाइन रिकॉर्ड कितना पूरा है

राज्य में रिकॉर्ड को डिजिटल करने का काम चरणों में हुआ है, इसलिए कुछ तहसीलों का ब्यौरा पूरा मिलता है और कुछ का अधूरा। पहाड़ी और दूर के इलाक़ों में यह काम बाद में पहुँचा।

अपने गाँव का रिकॉर्ड पोर्टल पर न मिले तो इसका मतलब यह नहीं कि वह मौजूद नहीं है। मूल रिकॉर्ड पटवारी और तहसील में रहता है, और वहीं से नक़ल मिल जाती है।

मोबाइल पर देखते समय

रिकॉर्ड तालिका के रूप में खुलता है और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाता है। रकबा और अधिकार वाले ख़ाने अक्सर उसी कटे हिस्से में रहते हैं।

फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। कई इलाक़ों में इंटरनेट की गति कम रहती है, इसलिए एक बार डाउनलोड कर लेना बार-बार खोलने से बेहतर रहता है।

गिरदावरी हर मौसम दर्ज होती है

गिरदावरी साल में दो बार दर्ज की जाती है, हर फ़सल के मौसम के हिसाब से। इसलिए उसमें पुरानी प्रविष्टि दिखना ग़लती नहीं, बस नई अभी चढ़ी नहीं होती।

बुवाई के बाद यह देख लेना चाहिए कि उस मौसम की फ़सल दर्ज हुई या नहीं। नुक़सान होने पर मुआवज़ा उसी प्रविष्टि के आधार पर बनता है, और बाद में उसे पीछे की तारीख़ से दर्ज कराना मुश्किल होता है।

बँटवारे के बाद अलग खेवट

पुश्तैनी ज़मीन में एक खेवट के नीचे कई हिस्सेदार दर्ज मिलते हैं। बँटवारा दर्ज कराए बिना हर हिस्से की अपनी पहचान नहीं बनती।

बेचते समय यही सबसे बड़ी अड़चन बनती है, क्योंकि ख़रीदार को साफ़ हिस्सा चाहिए होता है। बँटवारा तहसील में दर्ज होता है और उसके बाद हर हिस्से का अपना खेवट बन जाता है।

याद रखने लायक़ बातें

जमाबंदी मालिकाना दिखाती है और गिरदावरी फ़सल, दोनों को एक मत समझिए। खेवट, खतौनी और खसरा तीन अलग संख्याएँ हैं और नक़ल माँगते समय यही काम आती हैं।

ऑनलाइन देखना मुफ़्त है, पर जमा करने लायक़ फर्द तहसील से मिलती है। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा जम्मू कश्मीर के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।

FAQs

खेवट मालिक का नंबर है, खतौनी उस व्यक्ति का नंबर है जो ज़मीन जोतता है, और खसरा खेत के टुकड़े का नंबर। एक खेवट के नीचे कई खतौनियाँ और कई खसरे आ सकते हैं।

जमाबंदी की जो नक़ल निकलती है उसे इस क्षेत्र में फर्द कहते हैं। बैंक से क़र्ज़, बिक्री और कई सरकारी आवेदनों में यही माँगी जाती है, और जमा करने लायक़ फर्द तहसील से मिलती है।

बीस मरला का एक कनाल होता है और आठ कनाल का एक एकड़। बोलचाल में लोग एकड़ या बीघे में बात करते हैं जबकि काग़ज़ पर कनाल-मरला दर्ज रहता है, इसलिए सौदे में यह बदलाव साफ़ कर लीजिए।

जब एक खसरा बँटकर कई हिस्सों में बँटता है तो हर हिस्से का अलग नक़्शा बनता है, जिसे तत्तीमा कहते हैं। जमाबंदी रकबा बताती है, पर टुकड़ा कहाँ है यह सिर्फ़ तत्तीमा से पता चलता है।