छत्तीसगढ़ का land record पोर्टल भुइयाँ कहलाता है, और नाम ही बता देता है कि वह किस काम का है। उस पर ज़मीन के दो मुख्य काग़ज़ मिलते हैं: खसरा, जिसमें हर खेत का अलग ब्यौरा रहता है, और B1, जिसमें पूरे गाँव की ज़मीन एक सूची में दर्ज होती है।
तीसरी चीज़ नक़्शा है, जो अलग विकल्प के रूप में दिया गया है। तीनों देखने के पैसे नहीं लगते। यह पन्ना पूरा रास्ता बताता है और यह भी कि रिकॉर्ड में लिखी किस पंक्ति का क्या मतलब है। हमारे रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ के 19 ज़िले, 174 तहसीलें और 23,106 गाँव दर्ज हैं।

पोर्टल और उसका पता
राज्य का पोर्टल bhuiyan.cg.nic.in है, जिसे राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग चलाता है। खोज में मिलती-जुलती निजी साइटें ऊपर आ जाती हैं, इसलिए पता देखकर ही खोलिए।
घर पर भुइयाँ और भु-नक्शा, दो हिस्से अलग-अलग दिखते हैं। पहले से खसरा और B1 मिलते हैं, दूसरे से नक़्शा। दोनों की ज़रूरत अलग मौक़ों पर पड़ती है और यही फ़र्क़ शुरू में समझ लेना चाहिए।
गाँव तक पहुँचने का रास्ता
पहले ज़िला चुना जाता है, फिर तहसील, और उसके बाद गाँव की सूची खुलती है। गाँव के नाम राजस्व रिकॉर्ड की वर्तनी में होते हैं, जो बोलचाल के नाम से थोड़े अलग हो सकते हैं।
सूची में नाम के साथ गाँव का कोड भी दिखता है, और वही सबसे भरोसेमंद पहचान है। अपना गाँव किस तहसील में आता है यह छत्तीसगढ़ के ज़िले खोलकर देखा जा सकता है, जहाँ हर तहसील के गाँव जनसंख्या के साथ दर्ज हैं।
खसरा और खातेदार से खोज
गाँव चुनने के बाद दो तरह से खोजा जा सकता है: खसरा संख्या से, या खातेदार के नाम से। खसरा संख्या सबसे सीधा रास्ता है क्योंकि वह हर टुकड़े के लिए अलग होती है।
नाम से खोजने पर एक जैसे नाम कई निकलते हैं, इसलिए पिता के नाम से मिलान ज़रूरी है। पुरानी रसीद या बँटवारे के काग़ज़ पर खसरा संख्या लिखी रहती है, इसलिए खोजने से पहले वह निकाल लेना समय बचाता है।

खसरा में क्या लिखा रहता है
खसरे में सबसे पहले भूमि स्वामी का नाम और पिता का नाम आता है, फिर खसरा संख्या और रकबा। रकबा हेक्टेयर में लिखा जाता है, और यही वह जगह है जहाँ लोग सबसे ज़्यादा उलझते हैं क्योंकि बोलचाल में गिनती एकड़ में होती है।
उसके बाद ज़मीन की क़िस्म आती है, जो बताती है कि वह सिंचित है या असिंचित, खेती की है या किसी और काम की। नीचे यह भी दर्ज रहता है कि उस साल खेत में क्या बोया गया।
छत्तीसगढ़ पहले मध्य प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए दोनों में खसरा और B1 का ढाँचा एक जैसा है। फ़र्क़ पोर्टल और गाँव तक पहुँचने के रास्ते का है, जो MP भूलेख वाली पोस्ट में देखा जा सकता है।
B1 पूरे गाँव की सूची है
B1 को अधिकार अभिलेख कहते हैं। उसमें गाँव की सारी ज़मीन एक जगह दर्ज रहती है, हर खातेदार के नाम के साथ। यह तब काम आता है जब देखना हो कि गाँव में किसके नाम कितनी ज़मीन है।
बँटवारे के मामलों में B1 सबसे पहले देखा जाता है, क्योंकि उसमें सब हिस्सेदार एक साथ दिखते हैं। फ़ाइल बड़ी होती है, इसलिए मोबाइल पर खोलने से पहले डाउनलोड कर लेना बेहतर रहता है।
मुफ़्त नक़ल और हस्ताक्षरित प्रति
पोर्टल पर जो नक़ल बिना शुल्क खुलती है, वह देखने और अपने पास रखने के लिए है। उस पर यह बात लिखी भी रहती है।
बैंक, अदालत या सरकारी आवेदन में वही प्रति चलती है जिस पर विभाग के डिजिटल हस्ताक्षर हों। उसके लिए अलग विकल्प है और तय शुल्क लगता है, और मिलने वाली फ़ाइल पर सत्यापन संख्या छपी रहती है।
नक़्शा देखने का तरीक़ा
खसरा यह नहीं बताता कि खेत गाँव में कहाँ है। उसके लिए भू-नक्शा वाला हिस्सा खोलिए, जहाँ ज़िला, तहसील और गाँव चुनने के बाद नक़्शा खुलता है।
नक़्शे में अपनी खसरा संख्या पर क्लिक करने से उस टुकड़े का ब्यौरा और उसकी सीमा दिखती है। ख़रीदते समय नक़्शा और खसरा मिलाकर देखिए, क्योंकि रकबा सही होने पर भी टुकड़ा दूसरी जगह निकल सकता है।
नामांतरण अलग काम है
रजिस्ट्री होने से खसरे में नाम अपने आप नहीं बदलता। नाम चढ़वाने की प्रक्रिया तहसील में होती है और वह अलग से करानी पड़ती है।
जब तक वह पूरी नहीं होती, रिकॉर्ड में पुराने मालिक का ही नाम चलता रहता है, जिसका असर किसान योजनाओं, बीमा और आगे बेचने के समय पड़ता है। पूरी प्रक्रिया दाखिल ख़ारिज क्या है वाली पोस्ट में दी है।
ग़लती दिखे तो
नाम की वर्तनी, पिता का नाम, रकबा या क़िस्म ग़लत दर्ज हो तो सुधार का आवेदन तहसील में दिया जाता है। पटवारी मौक़े पर जाँच करके रिपोर्ट लगाता है और तहसीलदार मंज़ूरी देते हैं।
सीधी लिपिकीय भूल कुछ हफ़्तों में ठीक हो जाती है। जहाँ किसी और का दावा भी उसी ज़मीन पर हो, वहाँ रास्ता अलग होता है; दोनों का फ़र्क़ ज़मीन के काग़ज़ में नाम ग़लत हो तो वाली पोस्ट में समझाया है।
वन क्षेत्र और पट्टे वाली ज़मीन
राज्य के कई ज़िलों में ज़मीन वन अधिकार के तहत पट्टे पर दी गई है। ऐसी ज़मीन का रिकॉर्ड आम खसरे से अलग रखा जाता है और उस पर हस्तांतरण की शर्तें लागू रहती हैं।
इसलिए पट्टे वाली ज़मीन ख़रीदने या बेचने से पहले यह देख लेना ज़रूरी है कि उस पर क्या शर्त दर्ज है। यह जानकारी तहसील कार्यालय से मिलती है, और उसे अनदेखा करके किया गया सौदा बाद में टिकता नहीं।
एक खसरे पर कई नाम
पुश्तैनी ज़मीन में एक ही खसरा संख्या के आगे कई नाम दर्ज मिलते हैं, हिस्सा दिखाते हुए। यह ग़लती नहीं है, संयुक्त खातेदारी है।
ऐसी ज़मीन बेचते समय सब हिस्सेदारों की सहमति लगती है। बँटवारा दर्ज कराने के बाद हर हिस्से को अपनी खसरा संख्या मिल जाती है और सौदा सीधा हो जाता है।
किसान किताब और रिकॉर्ड का रिश्ता
तहसील से मिलने वाली भू-अधिकार पुस्तिका, जिसे किसान किताब कहा जाता है, उसी ब्यौरे की छपी हुई प्रति होती है जो खसरे और B1 में दर्ज है।
किताब पुरानी हो तो उसमें लिखा ब्यौरा आज के रिकॉर्ड से अलग हो सकता है, ख़ासकर बँटवारे या बिक्री के बाद। सही वही माना जाता है जो पोर्टल पर दर्ज है, इसलिए दोनों मिलाकर देख लेना ठीक रहता है।
ऑनलाइन और तहसील के रिकॉर्ड में अंतर दिखे तो
कई बार तहसील में दर्ज बदलाव पोर्टल पर आने में कुछ दिन लगाता है, क्योंकि प्रविष्टि पहले कार्यालय में चढ़ती है और फिर आगे जाती है।
इसलिए हाल में हुआ नामांतरण तुरंत न दिखे तो घबराने की ज़रूरत नहीं। दो-तीन हफ़्ते बाद भी पुराना ही दिखे तो तहसील में आवेदन संख्या के साथ पूछिए, और रसीद साथ ले जाइए।
मोबाइल पर देखते समय
खसरा और B1 दोनों तालिका के रूप में आते हैं और छोटी स्क्रीन पर दाईं ओर से कट जाते हैं। रकबा और क़िस्म वाले ख़ाने अक्सर उसी हिस्से में रहते हैं।
फ़ाइल डाउनलोड करके देखना सबसे आसान हल है। सर्वर सुबह के समय व्यस्त रहता है क्योंकि तहसीलों का काम उसी समय चलता है, इसलिए पन्ना न खुले तो दोपहर बाद देखिए।
आवेदन की स्थिति देखते रहिए
नामांतरण या सुधार का आवेदन देने के बाद उसकी स्थिति आवेदन संख्या से देखी जा सकती है। इससे पता चलता है कि फ़ाइल पटवारी के पास है या तहसीलदार के पास।
रसीद के बिना यह जानकारी नहीं मिलती, इसलिए आवेदन देते समय रसीद लेना सबसे ज़रूरी क़दम है। देरी होने पर शिकायत भी उसी के आधार पर होती है।
याद रखने लायक़ बातें
खसरा एक खेत का ब्यौरा है और B1 पूरे गाँव का, इसलिए काम के हिसाब से चुनिए। नक़्शा तीसरी चीज़ है और ख़रीदते समय उसे देखे बिना तस्वीर अधूरी रहती है।
देखने का कोई शुल्क नहीं है; पैसे सिर्फ़ उस प्रति के लगते हैं जिस पर विभाग के डिजिटल हस्ताक्षर हों। राज्य के पोर्टल और नियमों का ब्यौरा छत्तीसगढ़ के ज़मीन रिकॉर्ड वाले पन्ने पर है।
FAQs
खसरा, जिसमें हर खेत का अलग ब्यौरा रहता है, और B1, जिसमें पूरे गाँव की ज़मीन एक सूची में दर्ज होती है। नक़्शा अलग हिस्से में मिलता है और तीनों देखने के पैसे नहीं लगते।
हेक्टेयर में। बोलचाल में गिनती अक्सर एकड़ में होती है, इसलिए यहीं सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी होती है। सौदा करते समय इकाई साफ़ कर लेनी चाहिए।
ऐसी ज़मीन का रिकॉर्ड आम खसरे से अलग रखा जाता है और उस पर हस्तांतरण की शर्तें लागू रहती हैं। जानकारी तहसील कार्यालय से मिलती है, और शर्त अनदेखी करके किया गया सौदा टिकता नहीं।
प्रविष्टि पहले कार्यालय में चढ़ती है और फिर आगे जाती है, इसलिए कुछ दिन लग सकते हैं। दो-तीन हफ़्ते बाद भी पुराना दिखे तो आवेदन संख्या के साथ तहसील में पूछिए।