भारत का सबसे बड़ा गाँव सवा छियासठ हज़ार लोगों का है। यह आँकड़ा पहली बार सुनने में ग़लत लगता है, क्योंकि इतनी आबादी पर तो कई ज़िला मुख्यालय भी नहीं होते। फिर भी रिकॉर्ड में वह गाँव ही है, और इसकी वजह गिनती के तरीक़े में है, आबादी में नहीं।
यह सूची हमारे अपने रिकॉर्ड से बनी है, जिसमें जनगणना 2011 के 5,89,883 गाँव दर्ज हैं। नीचे बीस सबसे बड़े गाँव हैं, और उसके बाद वह बात है जो इस सूची को समझने के लिए ज़रूरी है: गाँव और शहर का फ़र्क़ आबादी से तय नहीं होता।

सबसे बड़े बीस गाँव
सबसे ऊपर महाराष्ट्र के पुणे ज़िले का फुरसुंगी है, जिसकी आबादी 66,062 दर्ज है। दूसरे नंबर पर केरल के मलप्पुरम ज़िले का एडक्करा है, 60,573 लोगों के साथ, और तीसरे पर उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले का गोला रेंज, 56,331 के साथ।
इसके बाद केरल के इडुक्की ज़िले की कन्नन देवन हिल्स, फिर मलप्पुरम का वंडूर, आंध्र प्रदेश का जंगारेड्डीगुडेम, मलप्पुरम का वाझिक्कडवु, कुरनूल का नंदीकोटकूर, तिरुवनंतपुरम का कोट्टुक्कल और कृष्णा ज़िले का वुय्यूरु आते हैं। पहले दस में से पाँच अकेले केरल के हैं।
अगले दस में असम का चारी दुआर वन क्षेत्र, मलप्पुरम का तनूर, कृष्णा का नंदीगामा, उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद ज़िले का दसना देहात, कोट्टायम का एरुमेली साउथ, पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी का पटकाटा, कोल्लम का तेवलक्करा, बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर का बरियारपुर उर्फ़ बाज़िदपुर, मलप्पुरम का पुलपट्टा और इडुक्की का कट्टप्पना शामिल हैं।
केरल इस सूची पर क्यों छाया हुआ है
बीस में से आठ गाँव अकेले केरल के हैं, और उनमें से पाँच एक ही ज़िले मलप्पुरम के। यह संयोग नहीं है, यह वहाँ की बसावट का ढाँचा है।
केरल में घर एक जगह गुच्छे में नहीं बनते, वे लंबी पट्टी में फैले रहते हैं, और गाँव तथा क़स्बे के बीच साफ़ ख़ाली जगह नहीं मिलती। राजस्व गाँव की सीमा इसीलिए बहुत बड़ी बनती है और उसके भीतर बहुत सारे लोग आ जाते हैं। उत्तर भारत में इतनी ही आबादी कई अलग-अलग गाँवों में बँटी होती है।

गाँव और शहर का फ़र्क़ आबादी से तय नहीं होता
यही वह बात है जो पूरी सूची को समझा देती है। जनगणना किसी बस्ती को शहर तभी मानती है जब वह तीन शर्तें एक साथ पूरी करे: आबादी कम से कम पाँच हज़ार हो, जनसंख्या घनत्व एक तय सीमा से ऊपर हो, और तीन चौथाई पुरुष कामगार खेती के अलावा किसी काम में लगे हों।
अगर इनमें से एक भी शर्त पूरी न हो, तो बस्ती गाँव ही रहती है, चाहे उसमें पचास हज़ार लोग रहते हों। इसीलिए खेती पर टिके बड़े गाँव रिकॉर्ड में गाँव बने रहते हैं, और उनसे बहुत छोटी क़स्बाई बस्तियाँ शहर गिनी जाती हैं।
इसका असर रोज़मर्रा के काम पर पड़ता है
यह सिर्फ़ किताबी फ़र्क़ नहीं है। गाँव की पहचान पर ही तय होता है कि वहाँ पंचायत चलेगी या नगर निकाय, और उसी से यह भी तय होता है कि कौन सी योजनाएँ वहाँ लागू होंगी।
मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना का ग्रामीण हिस्सा और ग्रामीण सड़क योजनाएँ, सब गाँव की पहचान से जुड़ी हैं। यही वजह है कि बड़ी आबादी वाले गाँव के लोग भी उन्हीं ग्रामीण योजनाओं के दायरे में आते हैं, और उनका ब्यौरा नरेगा जॉब कार्ड वाले हिस्से में राज्यवार दिया गया है।
राजस्व गाँव और बसा हुआ गाँव
रिकॉर्ड में गाँव का मतलब राजस्व गाँव होता है, यानी वह इकाई जिसकी अपनी सीमा, अपना नंबर और अपना अभिलेख है। उसके भीतर कई टोले और मजरे हो सकते हैं, जिनके अपने नाम चलते हैं पर रिकॉर्ड में वे अलग दर्ज नहीं होते।
इसीलिए एक बड़े गाँव की आबादी असल में कई बस्तियों की जुड़ी हुई गिनती होती है। राजस्व गाँव का मतलब साफ़ हो जाए तो ये आँकड़े अपने आप समझ में आने लगते हैं।
वन क्षेत्र भी गाँव की तरह दर्ज होते हैं
सूची में असम का चारी दुआर वन क्षेत्र दिखता है, जो नाम से ही बता देता है कि वह आम गाँव नहीं है। ऐसे कई वन क्षेत्र राजस्व रिकॉर्ड में अलग इकाई के रूप में दर्ज हैं और उनमें रहने वाले लोग उसी इकाई में गिने जाते हैं।
यही बात चाय बाग़ानों और बड़े बाग़ान क्षेत्रों पर भी लागू होती है, ख़ासकर असम और केरल में। कन्नन देवन हिल्स इसका उदाहरण है, जहाँ आबादी बाग़ानों में काम करने वाले परिवारों की है।
सबसे बड़े गाँव किन राज्यों में हैं
बीस की सूची में केरल आठ के साथ सबसे आगे है, आंध्र प्रदेश चार के साथ दूसरे नंबर पर, और महाराष्ट्र, उत्तराखंड, असम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा बिहार के एक-एक गाँव हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि इस सूची में वे राज्य नहीं हैं जिनके पास सबसे ज़्यादा गाँव हैं। उत्तर प्रदेश में एक लाख से ज़्यादा गाँव हैं, पर उनमें से सिर्फ़ एक इस सूची में आता है, क्योंकि वहाँ आबादी बहुत सारे छोटे गाँवों में बँटी है। पूरी राज्यवार गिनती भारत में कुल कितने गाँव हैं वाली पोस्ट में दी है।
आबादी का बँटवारा कैसा है
बड़े गाँव अपवाद हैं, नियम नहीं। दस हज़ार से ज़्यादा आबादी वाले गाँव पूरे देश में 4,665 हैं, यानी कुल गाँवों का एक प्रतिशत भी नहीं।
सबसे बड़ा हिस्सा दो सौ से एक हज़ार तक की आबादी वाले गाँवों का है, जो 2,31,276 हैं। एक हज़ार से पाँच हज़ार तक के गाँव 2,25,777 हैं। यानी आम भारतीय गाँव कुछ सौ लोगों का है, पचास हज़ार का नहीं।
अपने गाँव की आबादी कैसे देखें
हर गाँव का अपना पन्ना यहाँ मौजूद है, जिसमें जनसंख्या, पुरुष और महिला की अलग गिनती, क्षेत्रफल, पिन कोड और बस तथा रेल की दूरी दी गई है।
राज्य से होते हुए ज़िला, तहसील और गाँव तक पहुँचा जा सकता है, या नाम से सीधे खोजा जा सकता है। पिन कोड के साथ गाँव ढूँढ़ना हो तो पिन कोड वाला टूल सबसे तेज़ रास्ता है।
ये आँकड़े 2011 के हैं
यह गिनती जनगणना 2011 की है, जो अब तक का आख़िरी पूरा गाँववार रिकॉर्ड है। तब से कई बड़े गाँव नगर पंचायत या नगर पालिका में बदल चुके हैं, इसलिए आज की सूची कुछ अलग बन सकती है।
अगली गिनती की तैयारी चल रही है और उसका ब्यौरा हमारे जनगणना 2027 वाले पन्ने पर रखा जाता है। गाँव स्तर की तालिकाएँ सबसे आख़िर में आती हैं, इसलिए यह सूची कुछ और साल तक यही रहेगी।
बड़ा गाँव होने का मतलब सुविधाएँ नहीं
यह मान लेना आसान है कि पचास हज़ार आबादी वाले गाँव में सब कुछ होगा। रिकॉर्ड ऐसा नहीं कहता। सुविधाएँ इस बात पर टिकी हैं कि इकाई गाँव मानी जाती है या शहर, और गाँव के लिए मानक अलग होते हैं।
इसीलिए बड़े गाँवों में अक्सर वही एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और वही एक पंचायत भवन होता है जो बहुत छोटे गाँव में होता है, जबकि उस पर भार कई गुना ज़्यादा पड़ता है। पानी, नाली और कचरे की व्यवस्था पर यह दबाव सबसे पहले दिखता है।
नगर पंचायत बनने पर क्या बदलता है
जब कोई बड़ा गाँव नगर पंचायत में बदलता है, तो उसकी पंचायत ख़त्म होकर निकाय बन जाता है और कर की व्यवस्था बदल जाती है। सड़क, नाली और सफ़ाई का ज़िम्मा निकाय पर आ जाता है।
साथ ही ग्रामीण योजनाओं का लाभ बंद हो जाता है, क्योंकि वे सिर्फ़ ग्रामीण क्षेत्र के लिए होती हैं। यही वजह है कि ऐसा बदलाव अक्सर गाँव में बहस का विषय बनता है।
इस सूची से क्या निकलता है
पहली बात, गाँव होना आबादी का नहीं, काम और बसावट का मामला है। दूसरी, दक्षिण भारत में गाँव बड़े हैं और उत्तर में ज़्यादा, और यही फ़र्क़ हर राज्यवार आँकड़े में दिखता है।
तीसरी बात सबसे काम की है: अपने गाँव की तुलना राष्ट्रीय औसत से कीजिए, सबसे बड़े गाँव से नहीं। दो सौ से हज़ार लोगों वाला गाँव ही भारत का आम गाँव है।
FAQs
जनगणना 2011 के अनुसार महाराष्ट्र के पुणे ज़िले का फुरसुंगी, जिसकी आबादी 66,062 दर्ज है। दूसरे नंबर पर केरल के मलप्पुरम ज़िले का एडक्करा है, 60,573 लोगों के साथ।
क्योंकि गाँव और शहर का फ़र्क़ आबादी से तय नहीं होता। जनगणना किसी बस्ती को शहर तभी मानती है जब आबादी पाँच हज़ार से ऊपर हो, घनत्व तय सीमा से ज़्यादा हो और तीन चौथाई पुरुष कामगार खेती के अलावा काम करते हों। एक भी शर्त छूटने पर वह गाँव ही रहता है।
केरल में। बीस सबसे बड़े गाँवों में आठ केरल के हैं और उनमें से पाँच अकेले मलप्पुरम ज़िले के। वहाँ बसावट लंबी पट्टी में फैली होती है, इसलिए एक राजस्व गाँव की सीमा में बहुत लोग आ जाते हैं।
दो सौ से एक हज़ार लोगों का। ऐसे गाँव 2,31,276 हैं, जो सबसे बड़ा समूह है। दस हज़ार से ज़्यादा आबादी वाले गाँव सिर्फ़ 4,665 हैं, यानी कुल का एक प्रतिशत भी नहीं।