गाँव तक बस आती है या नहीं, और सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन कितनी दूर है, यह जनगणना हर गाँव के लिए अलग से दर्ज करती है। यह जानकारी अक्सर पढ़ी नहीं जाती, जबकि इलाज, पढ़ाई, मंडी और मज़दूरी, सब इसी पर टिके होते हैं।

हमने अपने रिकॉर्ड के सारे 5,89,883 गाँवों की यह प्रविष्टि गिनी है और नीचे वही आँकड़े दिए हैं। यह अनुमान नहीं है, हर गाँव के अपने रिकॉर्ड से बनी गिनती है।

गाँव तक बस और रेल कितनी दूर: असली आँकड़े

बस कितने गाँवों तक पहुँचती है

पूरे देश के गाँवों में से 30.6 प्रतिशत के भीतर ही बस सेवा दर्ज है। 18.6 प्रतिशत गाँवों में वह पाँच किलोमीटर के भीतर है। दोनों को मिलाकर लगभग आधे गाँव ऐसे हैं जहाँ से बस पकड़ना आसान कहा जा सकता है।

बाक़ी आधे में 20.1 प्रतिशत गाँवों के लिए बस पाँच से दस किलोमीटर दूर है, और 18.3 प्रतिशत के लिए दस किलोमीटर से भी ज़्यादा। यानी हर पाँच में से लगभग एक गाँव ऐसा है जहाँ बस तक पहुँचने के लिए पहले दस किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है।

रेल की तस्वीर बहुत अलग है

रेलवे स्टेशन सिर्फ़ 2.2 प्रतिशत गाँवों में या उनके पास दर्ज है। 8.4 प्रतिशत गाँवों से वह पाँच किलोमीटर के भीतर है।

सबसे बड़ा हिस्सा दूसरी तरफ़ है: 62.7 प्रतिशत गाँवों के लिए नज़दीकी स्टेशन दस किलोमीटर से ज़्यादा दूर है। यह बात उन योजनाओं को समझने में काम आती है जो रेल से जुड़ी सुविधाओं पर टिकी हैं, क्योंकि ज़्यादातर गाँवों के लिए रेल रोज़ का साधन है ही नहीं।

गाँव तक बस और रेल कितनी दूर: असली आँकड़े

राज्यों के बीच का फ़र्क़ सबसे बड़ी बात है

राष्ट्रीय औसत असली तस्वीर छिपा देता है। गुजरात में 94.8 प्रतिशत गाँवों तक बस या तो गाँव में है या पाँच किलोमीटर के भीतर। हरियाणा में यह 92.6 प्रतिशत है और महाराष्ट्र में 90.1 प्रतिशत।

दूसरे छोर पर छत्तीसगढ़ है, जहाँ यह आँकड़ा सिर्फ़ 14.5 प्रतिशत है। झारखंड में 19.6 प्रतिशत और बिहार में 28.3 प्रतिशत। यानी एक ही देश के भीतर यह अंतर छह गुना से ज़्यादा का है।

पहाड़ और रेल

रेल के मामले में सबसे कम आँकड़े पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों के हैं। मेघालय में पाँच किलोमीटर के भीतर स्टेशन वाले गाँव 0.1 प्रतिशत हैं और अरुणाचल प्रदेश में 0.6 प्रतिशत।

उत्तराखंड में यह 2.0 प्रतिशत है और जम्मू कश्मीर में 3.9 प्रतिशत। इन इलाक़ों में भूगोल ही ऐसा है कि रेल लाइन हर घाटी तक नहीं जा सकती, इसलिए वहाँ सड़क और बस ही असली साधन हैं।

अपने ज़िले के आँकड़े देखिए

राज्य का औसत भी बहुत कुछ छिपा देता है, क्योंकि एक ही राज्य के भीतर ज़िलों में बड़ा अंतर होता है। इसीलिए हमने ज़िलेवार गिनती देखने की सुविधा बनाई है।

ज़िला चुनिए और उसके सारे गाँवों की गिनती सामने आ जाएगी: कितने गाँवों में बस है, कितनों से पाँच किलोमीटर के भीतर है, और रेल के लिए वही ब्यौरा अलग से। बस और रेल वाला टूल खोलकर अपना ज़िला देखिए।

आँकड़ों को पढ़ते समय क्या ध्यान रखें

जनगणना यह दूरी शब्दों में दर्ज करती है, नापकर नहीं। इसीलिए हमने उन्हें चार समूहों में रखा है: गाँव में, पाँच किलोमीटर से कम, पाँच से दस, और दस से ज़्यादा।

कुछ रिकॉर्ड में सिर्फ़ इतना लिखा है कि सुविधा उपलब्ध है, दूरी नहीं लिखी। ऐसे गाँवों को हमने अलग समूह में रखा है, उन्हें गाँव वाले समूह में नहीं जोड़ा। जोड़ देने से हर उस राज्य का आँकड़ा बेहतर दिखने लगता जो छोटा वाक्य लिखता है, और तुलना झूठी हो जाती।

यह जानकारी किस काम आती है

ज़मीन ख़रीदने वाले के लिए यह सबसे सीधा सवाल है, क्योंकि सड़क और बस की दूरी क़ीमत तय करती है। नौकरी या पढ़ाई के लिए किसी गाँव में रहने का फ़ैसला करते समय भी यही देखा जाता है।

पंचायत के काम में यह और सीधे काम आता है। किसी योजना का प्रस्ताव बनाते समय यह दिखाना पड़ता है कि गाँव मुख्य रास्ते से कितनी दूर है, और उसका सबसे भरोसेमंद जवाब जनगणना का यही रिकॉर्ड है।

गाँव के अपने पन्ने पर पूरी जानकारी

हर गाँव के पन्ने पर उसकी बस और रेल की स्थिति अलग से दी गई है, जनसंख्या, क्षेत्रफल और पिन कोड के साथ। यानी ज़िले का आँकड़ा देखने के बाद अपने गाँव की अलग स्थिति भी देखी जा सकती है।

अपना गाँव खोजने का सबसे तेज़ रास्ता नाम से खोजना है, और पिन कोड भी उसी के साथ मिल जाता है। इसके लिए पिन कोड वाला टूल इस्तेमाल कीजिए या राज्य से होते हुए नीचे तक आइए।

बस और सड़क एक बात नहीं है

एक भ्रम यहाँ साफ़ कर देना चाहिए। जनगणना का यह ख़ाना बस सेवा का है, सड़क का नहीं। किसी गाँव तक पक्की सड़क हो सकती है और फिर भी वहाँ बस न आती हो।

सड़क बन जाने के बाद बस चलवाने के लिए परिवहन विभाग या निगम को अलग से कहना पड़ता है, और यह माँग पंचायत के प्रस्ताव से आगे बढ़ती है। इसलिए दोनों को एक मानकर यह नहीं कहा जा सकता कि सड़क है तो आना-जाना आसान है।

गिनती में हर गाँव शामिल है

यह प्रतिशत किसी नमूने से नहीं निकाले गए। हमारे रिकॉर्ड में दर्ज हर गाँव की प्रविष्टि पढ़ी गई है, और उसी से गिनती बनी है।

जहाँ प्रविष्टि ख़ाली मिली, उसे भी अलग समूह में गिना गया है, छिपाया नहीं गया। बस के लिए ऐसे गाँव 7.4 प्रतिशत हैं और रेल के लिए भी उतने ही, क्योंकि दोनों ख़ाने एक ही रिकॉर्ड में साथ आते हैं।

आँकड़े 2011 के हैं

यह गिनती जनगणना 2011 के रिकॉर्ड पर आधारित है, और उसके बाद कई गाँवों तक सड़क और बस पहुँची है। इसलिए आज की स्थिति इससे बेहतर हो सकती है, ख़ासकर उन राज्यों में जहाँ सड़क योजनाओं का काम तेज़ रहा।

फिर भी यह अब तक का सबसे पूरा गाँववार रिकॉर्ड है, क्योंकि इसमें हर गाँव अलग से गिना गया है। अगली जनगणना के आँकड़े आने पर यह तुलना और साफ़ होगी; उसकी तैयारी और तारीख़ों का ब्यौरा हमारे जनगणना 2027 वाले पन्ने पर रखा जाता है।

गाँव तक सड़क बनाने का काम कहाँ से होता है

गाँव की सड़कों और रास्तों का बहुत सारा काम मनरेगा के तहत होता है, क्योंकि उसमें सड़क, नाली और तालाब जैसे काम शामिल हैं। यानी दूरी घटाने का एक रास्ता गाँव के अपने हाथ में भी है।

पंचायत की सालाना योजना में कौन सा काम रखा गया है, यह जॉब कार्ड वाले रिकॉर्ड से देखा जा सकता है। राज्यवार पोर्टल और उनका तरीक़ा नरेगा जॉब कार्ड वाले हिस्से में दिया है।

स्कूल और अस्पताल की दूरी भी दर्ज है

जनगणना सिर्फ़ बस और रेल नहीं गिनती। हर गाँव के लिए स्कूल, अस्पताल, बैंक, डाकघर और बिजली की स्थिति भी उसी रिकॉर्ड में दर्ज होती है।

बस की दूरी इनमें सबसे ज़्यादा मायने रखती है, क्योंकि बाक़ी सुविधाएँ अक्सर उसी रास्ते से पहुँच में आती हैं। जहाँ बस दस किलोमीटर दूर है, वहाँ अस्पताल तक पहुँचना अपने आप मुश्किल हो जाता है, भले अस्पताल उतनी दूर न हो।

कुछ बातें जो इन आँकड़ों से निकलती हैं

पहली, देश के आधे गाँव बस से पाँच किलोमीटर के भीतर हैं और आधे नहीं। दूसरी, रेल ग्रामीण भारत का रोज़मर्रा का साधन नहीं है, क्योंकि दो तिहाई गाँवों से स्टेशन दस किलोमीटर से ज़्यादा दूर है।

तीसरी और सबसे ज़रूरी बात यह कि औसत से कुछ ख़ास पता नहीं चलता। असली फ़र्क़ राज्य और ज़िले के स्तर पर दिखता है, और वही देखकर कोई फ़ैसला लेना चाहिए। राज्यवार पूरी गिनती भारत में कुल कितने गाँव हैं वाली पोस्ट में दी है।

FAQs

जनगणना 2011 के रिकॉर्ड में 30.6 प्रतिशत गाँवों के भीतर बस सेवा दर्ज है और 18.6 प्रतिशत के लिए वह पाँच किलोमीटर के भीतर है। यानी लगभग आधे गाँवों से बस पकड़ना आसान कहा जा सकता है।

62.7 प्रतिशत गाँवों के लिए नज़दीकी स्टेशन दस किलोमीटर से ज़्यादा दूर है, और सिर्फ़ 2.2 प्रतिशत गाँवों में या उनके पास स्टेशन दर्ज है। ज़्यादातर गाँवों के लिए रेल रोज़ का साधन नहीं है।

गुजरात में 94.8 प्रतिशत गाँवों तक बस गाँव में या पाँच किलोमीटर के भीतर है, उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र। सबसे कम छत्तीसगढ़ में है, जहाँ यह 14.5 प्रतिशत है।

नहीं। जनगणना का यह ख़ाना बस सेवा का है, सड़क का नहीं। पक्की सड़क होने पर भी बस न चलना आम है, और उसके लिए परिवहन विभाग से अलग माँग करनी पड़ती है।