भारत के एक ज़िले में 8,275 गाँव हैं। दूसरे में 3,901। और कई ज़िले ऐसे भी हैं जिनमें सौ से भी कम। यह फ़र्क़ ज़िले के आकार से नहीं आता, इसलिए इसे समझने के लिए यह देखना पड़ता है कि गाँव गिना कैसे जाता है।

यह गिनती हमारे अपने रिकॉर्ड से निकली है, जिसमें जनगणना 2011 के 5,89,883 गाँव, 5,677 तहसीलें और 657 ज़िले दर्ज हैं। नीचे सबसे ऊपर के ज़िले और तहसीलें हैं, और उसके बाद वह वजह जो इस अंतर को बनाती है।

किस ज़िले और तहसील में सबसे ज़्यादा गाँव हैं

सबसे ज़्यादा गाँवों वाले ज़िले

सबसे ऊपर पश्चिम बंगाल का पश्चिम मेदिनीपुर है, जिसमें 8,275 गाँव दर्ज हैं। यह दूसरे नंबर वाले ज़िले से दोगुने से भी ज़्यादा है।

दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश का आज़मगढ़ है, 3,901 गाँवों के साथ। उसके बाद पश्चिम बंगाल का बाँकुड़ा 3,770 के साथ, हिमाचल प्रदेश का काँगड़ा 3,731 के साथ, और छत्तीसगढ़ का रायगढ़ 3,358 के साथ आता है।

अगले पाँच में उत्तर प्रदेश का ग़ाज़ीपुर 3,241, हिमाचल का मंडी 3,232, उत्तर प्रदेश का गोरखपुर 3,182, आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम 3,180 और हिमाचल का शिमला 3,165 गाँवों के साथ शामिल हैं। बारह की सूची में उत्तर प्रदेश के पाँच ज़िले हैं और हिमाचल प्रदेश के तीन।

सबसे ज़्यादा गाँवों वाली तहसीलें

तहसील के स्तर पर सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले की हरैया तहसील है, जिसमें अकेले 1,395 गाँव हैं। कई राज्यों के पूरे ज़िले में इतने गाँव नहीं होते।

उसके बाद ग़ाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद तहसील 1,094 गाँवों के साथ, बस्ती तहसील 1,037 के साथ, असम के कार्बी आंगलोंग की फुलोनी 1,015 के साथ और आज़मगढ़ की सगड़ी 922 के साथ आती है। पहली दस में सात तहसीलें अकेले उत्तर प्रदेश की हैं।

किस ज़िले और तहसील में सबसे ज़्यादा गाँव हैं

गिनती गाँव की नहीं, राजस्व गाँव की होती है

यही इस पूरे अंतर की जड़ है। रिकॉर्ड में गाँव का मतलब राजस्व गाँव है, यानी वह इकाई जिसकी अपनी सीमा और अपना अभिलेख है। वह बस्ती के हिसाब से नहीं, ज़मीन के हिसाब से बनती है।

जहाँ खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटे हैं, वहाँ राजस्व इकाइयाँ भी ज़्यादा बनती हैं, भले आबादी उतनी न हो। इसीलिए उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गाँवों की संख्या बहुत ज़्यादा निकलती है। राजस्व गाँव का मतलब समझ लेने पर यह आँकड़ा अपने आप साफ़ हो जाता है।

पहाड़ों में गाँव छोटे और ज़्यादा होते हैं

बारह ज़िलों की सूची में हिमाचल प्रदेश के तीन ज़िले हैं, जबकि राज्य की कुल आबादी बहुत बड़ी नहीं है। वजह भूगोल है।

पहाड़ी इलाक़ों में बस्तियाँ छोटी होती हैं और दूर-दूर बिखरी रहती हैं, क्योंकि समतल ज़मीन कम मिलती है। हर ढलान की अपनी अलग बस्ती बनती है और रिकॉर्ड में हर एक अलग इकाई के रूप में दर्ज होती है। उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में भी यही ढाँचा दिखता है।

दक्षिण भारत में उल्टी तस्वीर है

केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गाँवों की संख्या कम है, पर हर गाँव बड़ा है। वहाँ एक राजस्व इकाई के भीतर हज़ारों लोग आ जाते हैं।

इसीलिए सबसे बड़े गाँवों की सूची में दक्षिण के राज्य छाए रहते हैं, जबकि सबसे ज़्यादा गाँवों की सूची में उत्तर के। दोनों सूचियाँ एक ही बात को दो तरफ़ से दिखाती हैं, और सबसे बड़े गाँव भारत के सबसे बड़े गाँव वाली पोस्ट में दिए हैं।

वन क्षेत्र और बाग़ान भी अलग इकाई होते हैं

असम के कार्बी आंगलोंग की दो तहसीलें इस सूची में हैं, और वहाँ का ढाँचा बाक़ी से अलग है। उस इलाक़े में वन क्षेत्र, बाग़ान और छोटी बस्तियाँ अलग-अलग राजस्व इकाइयों के रूप में दर्ज हैं।

ऐसी इकाइयों में कई बार बहुत कम लोग रहते हैं, और कुछ में कोई नहीं रहता। रिकॉर्ड उन्हें फिर भी गिनता है, क्योंकि गिनती ज़मीन की इकाई की होती है, आबादी की नहीं।

इसका असर आपके काम पर कहाँ पड़ता है

जिस तहसील में चौदह सौ गाँव हों, वहाँ पोर्टल पर गाँव की सूची बहुत लंबी खुलती है और अपना नाम ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता है। भूलेख, राशन और जॉब कार्ड, हर जगह यही सूची सामने आती है।

ऐसे में गाँव का कोड पहले से पता होना समय बचा देता है, क्योंकि सूची कोड के क्रम में बनी होती है। अपनी तहसील के सारे गाँव एक जगह देखने का तरीक़ा तहसील के सारे गाँव कैसे देखें वाली पोस्ट में है।

एक जैसे नाम की समस्या यहीं से आती है

जिस तहसील में हज़ार से ज़्यादा गाँव हैं, वहाँ एक ही नाम के दो या तीन गाँव मिलना आम है। नाम के आगे खुर्द, कलाँ, उर्फ़ या किसी और शब्द का जुड़ना इसी वजह से शुरू हुआ।

इसीलिए किसी भी सरकारी फ़ॉर्म में गाँव के साथ तहसील और ज़िला लिखना ज़रूरी है। तीनों मिलकर ही पहचान पक्की करते हैं, और यह बात फ़ॉर्म में गाँव, तहसील और पिन कोड कैसे भरें वाली पोस्ट में विस्तार से दी है।

पिन कोड की गिनती अलग चलती है

गाँवों की संख्या ज़्यादा होने का मतलब यह नहीं कि पिन कोड भी उतने हैं। पिन कोड डाक क्षेत्र का होता है, इसलिए एक ही कोड के नीचे कई गाँव आते हैं।

पूरे देश में गाँवों के आगे दर्ज अलग-अलग कोड 17,835 हैं। इसीलिए किसी बड़ी तहसील के सारे गाँवों का कोड अक्सर एक ही निकलता है, और उससे गाँव की पहचान नहीं होती।

अपने ज़िले की गिनती कैसे देखें

हर राज्य के पन्ने पर उसके ज़िले दिए हैं, और हर ज़िले के पन्ने पर उसकी तहसीलें तथा उनके गाँव। वहीं से यह भी दिखता है कि किस तहसील में कितने गाँव हैं।

गाँव तक पहुँचकर उसकी आबादी, क्षेत्रफल, पिन कोड और बस तथा रेल की दूरी भी देखी जा सकती है। ज़िले में बस और रेल की स्थिति एक साथ देखनी हो तो बस और रेल वाला टूल सबसे तेज़ रास्ता है।

ये आँकड़े 2011 के हैं

यह गिनती जनगणना 2011 की है। उसके बाद कई ज़िले बँट चुके हैं और नए ज़िले बने हैं, इसलिए आज की ज़िलेवार सूची कुछ अलग बनेगी, ख़ासकर उन राज्यों में जहाँ बँटवारा ज़्यादा हुआ।

गाँवों की कुल संख्या इससे उतनी नहीं बदलती, क्योंकि ज़िला बँटने से गाँव नए नहीं बनते, सिर्फ़ किसी दूसरे ज़िले में गिने जाने लगते हैं। सरकारी काम में गाँव का रिकॉर्ड तहसील से जुड़ा रहता है, और राज्यवार उसका ब्यौरा ज़मीन के रिकॉर्ड वाले हिस्से में है।

बड़े ज़िलों में कागज़ी काम धीमा क्यों रहता है

एक तहसीलदार के नीचे जितने गाँव होंगे, हर फ़ाइल पर उतना ही समय लगेगा। जिस तहसील में चौदह सौ गाँव हैं, वहाँ एक ही पटवारी या लेखपाल के ज़िम्मे कई गाँव आते हैं।

इसीलिए ऐसे इलाक़ों में नामांतरण और सुधार के आवेदन में ज़्यादा समय लगता है। इसका हल इतना ही है कि आवेदन पूरा और सही भरा जाए, और रसीद लेकर स्थिति समय-समय पर देखी जाए।

नए ज़िले बनने से गिनती बदलती है

पिछले पंद्रह साल में कई राज्यों ने बड़े ज़िले तोड़कर नए ज़िले बनाए हैं। इससे किसी एक ज़िले के गाँवों की संख्या अचानक आधी दिख सकती है, जबकि ज़मीन पर कुछ नहीं बदला।

इसलिए किसी ज़िले का पुराना और नया आँकड़ा सीधे जोड़ना ग़लत नतीजे देता है। तुलना करते समय यह देखना पड़ता है कि उस समय ज़िले की सीमा क्या थी।

इस गिनती से क्या निकलता है

पहली बात, गाँवों की संख्या आबादी नहीं बताती। पश्चिम मेदिनीपुर में आठ हज़ार से ज़्यादा गाँव हैं, पर उनमें से बहुत सारे बहुत छोटे हैं।

दूसरी बात, यह संख्या ज़मीन के बँटवारे और भूगोल का नतीजा है। और तीसरी, जिस तहसील में गाँव ज़्यादा हैं, वहाँ हर सरकारी पोर्टल पर अपना गाँव ढूँढ़ना उतना ही मुश्किल रहेगा।

FAQs

पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर में, जहाँ 8,275 गाँव दर्ज हैं। यह दूसरे नंबर वाले आज़मगढ़ से दोगुने से भी ज़्यादा है, जिसमें 3,901 गाँव हैं।

उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले की हरैया तहसील में, जहाँ अकेले 1,395 गाँव हैं। पहली दस तहसीलों में सात उत्तर प्रदेश की हैं।

क्योंकि गिनती राजस्व गाँव की होती है, बस्ती की नहीं। जहाँ खेत छोटे टुकड़ों में बँटे हैं वहाँ राजस्व इकाइयाँ ज़्यादा बनती हैं, भले आबादी उतनी न हो।

पहाड़ों में बस्तियाँ छोटी और बिखरी होती हैं, क्योंकि समतल ज़मीन कम मिलती है। हर ढलान की अपनी बस्ती बनती है और रिकॉर्ड में हर एक अलग इकाई के रूप में दर्ज होती है।