भारत में कुछ गाँव ऐसे हैं जिनकी दर्ज आबादी एक है। एक व्यक्ति, और वह पूरा गाँव। यह छपाई की ग़लती नहीं है, यह जनगणना 2011 का दर्ज आँकड़ा है, और इसके पीछे एक सीधी सी वजह है।

हमारे रिकॉर्ड में 5,89,883 गाँव दर्ज हैं। उनमें से 16,658 ऐसे हैं जिनकी आबादी पचास से कम है, यानी हर पैंतीस में से एक गाँव इतना छोटा है कि उसे बस्ती कहना भी मुश्किल हो।

भारत के सबसे छोटे गाँव, जहाँ 50 से कम लोग रहते हैं

सबसे छोटे गाँव कहाँ हैं

एक व्यक्ति वाले गाँव कई राज्यों में मिलते हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसे गाँव सबसे ज़्यादा हैं, जिनमें बाँकुड़ा का केशेशोल, मालदा का किशनपुर और बनियाबाटी, पश्चिम मेदिनीपुर का भुलकाचक और हिजलतला बातिताकी, पूर्व मेदिनीपुर का छोटा बलरामपुर, पुरुलिया का प्रेमसिंहडीह और उत्तर दिनाजपुर का सादीपुर शामिल हैं।

महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िले में भी तीन ऐसे गाँव हैं: मलकापुर, वजियाबाद और शरीफ़ाबाद। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले का सिधौर भी इसी सूची में आता है।

पचास से कम आबादी वाले गाँव किस राज्य में ज़्यादा हैं

उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहाँ ऐसे 2,579 गाँव हैं। उसके बाद हिमाचल प्रदेश 2,027 के साथ, उत्तराखंड 1,651 के साथ, मध्य प्रदेश 1,358 के साथ और अरुणाचल प्रदेश 1,157 के साथ आता है।

झारखंड में ऐसे 1,122 गाँव हैं, कर्नाटक में 941 और असम में 770। ध्यान देने लायक़ बात यह है कि इस सूची में पहाड़ी राज्य अपनी आबादी के मुक़ाबले कहीं ऊपर हैं।

भारत के सबसे छोटे गाँव, जहाँ 50 से कम लोग रहते हैं

गाँव में कोई क्यों नहीं रहता

सबसे बड़ी वजह वही है जो हर ऐसे आँकड़े के पीछे है: गिनती राजस्व इकाई की होती है, बस्ती की नहीं। एक राजस्व गाँव तब भी रिकॉर्ड में रहता है जब वहाँ कोई न रहता हो, क्योंकि उसकी ज़मीन तो मौजूद है।

ऐसी इकाइयाँ अक्सर जंगल, चरागाह, पहाड़ी ढलान या बंजर ज़मीन होती हैं, जिनका अपना नंबर और अपना अभिलेख है। राजस्व गाँव का मतलब समझ लेने पर यह बात उलझी नहीं रहती।

पलायन दूसरी बड़ी वजह है

पहाड़ी राज्यों में यह सबसे साफ़ दिखता है। उत्तराखंड और हिमाचल में कई गाँव ऐसे हैं जहाँ से परिवार काम और पढ़ाई के लिए नीचे के क़स्बों में चले गए और घर बंद रह गए।

जनगणना उसी को गिनती है जो गिनती की तारीख़ को वहाँ रह रहा हो, इसलिए ऐसे गाँव की दर्ज आबादी बहुत कम या शून्य हो जाती है। ज़मीन का रिकॉर्ड फिर भी उन्हीं परिवारों के नाम चलता रहता है, जो हर कुछ साल में नक़ल निकलवाते रहते हैं।

बँटवारे से भी छोटे गाँव बनते हैं

कई जगह एक बड़ा गाँव प्रशासनिक कारणों से दो या तीन इकाइयों में बाँट दिया गया, और एक हिस्से में बस्ती रह गई जबकि दूसरे में सिर्फ़ खेत।

ऐसे में रिकॉर्ड में दोनों अलग गाँव दिखते हैं, पर आबादी एक ही में गिनी जाती है। नाम के साथ खुर्द और कलाँ जुड़ना अक्सर इसी बँटवारे का निशान होता है।

आबादी का पूरा बँटवारा

पूरे देश की तस्वीर इस तरह बनती है। एक से उनचास लोगों वाले गाँव 16,658 हैं। पचास से एक सौ निन्यानबे तक के 50,270 हैं।

सबसे बड़ा हिस्सा दो सौ से एक हज़ार तक वाले गाँवों का है, जो 2,31,276 हैं, और उसके बाद एक हज़ार से पाँच हज़ार वाले 2,25,777 गाँव। दस हज़ार से ऊपर वाले सिर्फ़ 4,665 हैं, यानी सौ में से एक भी नहीं। सबसे बड़े गाँव भारत के सबसे बड़े गाँव वाली पोस्ट में दिए हैं।

जिन गाँवों के आगे आबादी दर्ज नहीं है

रिकॉर्ड में 42,852 गाँव ऐसे भी हैं जिनके आगे आबादी का आँकड़ा दर्ज नहीं है। यह अलग बात है और इसे शून्य आबादी मत समझिए।

ऐसा तब होता है जब जनगणना की तालिका में उस इकाई के लिए अलग प्रविष्टि नहीं बनी, या वह किसी बड़ी इकाई के भीतर गिन ली गई। हम इन्हें अलग रखते हैं और शून्य नहीं मानते, क्योंकि दोनों का मतलब अलग है।

छोटे गाँव में सुविधाएँ कैसी होती हैं

जितना छोटा गाँव, उतनी दूर सुविधाएँ। यह बात आँकड़ों में साफ़ दिखती है: छोटे गाँव आमतौर पर पहाड़ी या जंगल वाले इलाक़ों में हैं, और वहीं बस तथा रेल सबसे दूर हैं।

ऐसे गाँव में स्कूल, अस्पताल और बैंक भी पास के बड़े गाँव में होते हैं। अपने ज़िले की स्थिति बस और रेल वाले टूल से देखी जा सकती है, जो हर ज़िले के गाँवों की दूरी गिनकर दिखाता है।

छोटे गाँव में सरकारी काम

बहुत छोटे गाँव की अपनी पंचायत नहीं होती। कई गाँव मिलकर एक ग्राम पंचायत बनाते हैं, और सारा काम उसी के ज़रिए होता है।

इसीलिए किसी योजना का आवेदन देते समय पंचायत का नाम अलग लिखा जाता है और गाँव का अलग। दोनों को एक मान लेने से आवेदन ग़लत जगह चला जाता है; यह फ़र्क़ फ़ॉर्म में गाँव, तहसील और पिन कोड कैसे भरें वाली पोस्ट में समझाया है।

ज़मीन का रिकॉर्ड फिर भी चलता रहता है

गाँव में कोई न रहे तब भी उसकी ज़मीन का अभिलेख बना रहता है, और उसकी नक़ल आज भी निकलती है। खसरा, खतौनी या जमाबंदी, नाम चाहे जो हो, इकाई वही रहती है।

यही वजह है कि पलायन के बाद भी लोग अपने पुश्तैनी गाँव की नक़ल निकलवाते रहते हैं। राज्यवार यह कहाँ और किस नाम से मिलता है, यह ज़मीन के रिकॉर्ड वाले हिस्से में दिया है।

क्या बिना आबादी वाला गाँव ख़त्म हो जाता है

नहीं। राजस्व इकाई तब तक बनी रहती है जब तक सरकार उसे किसी दूसरी इकाई में मिलाने का आदेश न दे। आबादी शून्य होने से वह अपने आप ख़त्म नहीं होती।

ऐसे गाँव की ज़मीन का लगान, बँटवारा और बिक्री सब पहले की तरह चलते रहते हैं। कई मामलों में मालिक शहर में रहता है और खेती बटाई पर होती है, फिर भी रिकॉर्ड उसी गाँव के नाम से चलता है।

छोटे गाँव और चुनाव

बहुत छोटे गाँव का अपना वार्ड नहीं बनता, वह पास के बड़े गाँव के वार्ड में जोड़ दिया जाता है। पंचायत चुनाव में उसका प्रतिनिधित्व उसी के ज़रिए होता है।

इसका सीधा असर यह पड़ता है कि छोटे गाँव की माँगें पंचायत की सूची में नीचे रह जाती हैं। लिखित प्रस्ताव और रसीद इसीलिए ऐसे गाँवों में और ज़्यादा काम आते हैं।

पचास से कम आबादी का मतलब क्या है

पचास लोग यानी लगभग दस परिवार। इतने में न स्कूल खुलता है, न उचित मूल्य की दुकान, क्योंकि दोनों के लिए तय संख्या चाहिए।

इसलिए ऐसे गाँव के बच्चे पास के गाँव के स्कूल जाते हैं और राशन भी वहीं से मिलता है। दुकान किस गाँव में है, यह राशन कार्ड पर लिखा रहता है, और श्रेणियाँ राशन कार्ड वाले हिस्से में राज्यवार दी गई हैं।

सबसे छोटे और सबसे बड़े गाँव का फ़ासला

एक तरफ़ एक व्यक्ति वाला गाँव है और दूसरी तरफ़ छियासठ हज़ार का। दोनों एक ही रिकॉर्ड में, एक ही श्रेणी में दर्ज हैं।

यही इस दस्तावेज़ की ख़ास बात है और उसकी सीमा भी। गाँव एक प्रशासनिक इकाई का नाम है, किसी तय आकार का नहीं, इसलिए दोनों को एक तराज़ू में तौलना ग़लत होगा।

ये आँकड़े 2011 के हैं

यह गिनती जनगणना 2011 की है। तब से पंद्रह साल बीत चुके हैं, और पलायन तथा नई बसावट दोनों ने तस्वीर बदली होगी।

अगली गिनती की तैयारी चल रही है और उसका ब्यौरा हमारे जनगणना 2027 वाले पन्ने पर है। खाली होते गाँव उस गिनती का सबसे दिलचस्प हिस्सा होंगे, क्योंकि पंद्रह साल का बदलाव पहली बार एक साथ दिखेगा।

FAQs

हाँ। जनगणना 2011 में कई गाँवों की दर्ज आबादी एक है, जैसे पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा ज़िले का केशेशोल। गिनती राजस्व इकाई की होती है, इसलिए इकाई तब भी रहती है जब वहाँ लगभग कोई न रहता हो।

16,658 गाँव, यानी हर पैंतीस में से लगभग एक। सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में हैं, जहाँ ऐसे 2,579 गाँव हैं, उसके बाद हिमाचल प्रदेश में 2,027 और उत्तराखंड में 1,651।

दो वजहें हैं। कुछ राजस्व इकाइयाँ जंगल, चरागाह या बंजर ज़मीन हैं जहाँ बस्ती कभी थी ही नहीं। बाक़ी जगह पलायन है, ख़ासकर पहाड़ी राज्यों में, जहाँ परिवार काम और पढ़ाई के लिए नीचे के क़स्बों में चले गए।

नहीं। राजस्व इकाई तब तक बनी रहती है जब तक उसे किसी दूसरी इकाई में मिलाने का आदेश न हो। उसकी नक़ल आज भी निकलती है और लगान, बँटवारा तथा बिक्री पहले की तरह चलते हैं।