आवास योजना में सबसे पहला सवाल हमेशा एक ही होता है। सूची में नाम है या नहीं। यह सूची गाँव के स्तर पर बनती है और ऑनलाइन खुली रहती है, इसलिए इसे देखने के लिए किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं होती।
यह पन्ना सूची देखने का तरीक़ा देता है, और यह भी बताता है कि नाम आता कहाँ से है, क्योंकि यही बात ज़्यादातर लोगों को पता नहीं होती।

सूची देखने का तरीक़ा
योजना के पोर्टल पर awaassoft वाले हिस्से में report खोलिए। वहाँ राज्य, ज़िला, ब्लॉक और पंचायत चुनते ही उस पंचायत की पूरी सूची खुल जाती है, जिसमें लाभार्थी का नाम, पिता का नाम, क्रम संख्या और मंज़ूरी की स्थिति रहती है।
सूची पंचायत के हिसाब से बनती है, गाँव के हिसाब से नहीं। एक पंचायत में कई गाँव होते हैं, इसलिए अपनी पंचायत का नाम पता होना ज़रूरी है। यह नाम पुराने राशन कार्ड, जॉब कार्ड या किसी भी पंचायत रसीद पर लिखा मिलता है।
नाम आता कहाँ से है
ग्रामीण आवास की सूची किसी आवेदन से नहीं बनती। यह सामाजिक आर्थिक जनगणना के आँकड़ों से बनती है, जिसे SECC कहा जाता है। उसमें दर्ज हालात के आधार पर परिवार छाँटे जाते हैं, फिर ग्राम सभा उस सूची पर मुहर लगाती है।
इसीलिए बहुत से लोग कहते हैं कि उन्होंने फ़ॉर्म भरा ही नहीं और नाम आ गया, या फ़ॉर्म भरने के बाद भी नाम नहीं आया। जिस जनगणना से यह सूची बनी, उसका ढाँचा और अगली गिनती का ब्यौरा जनगणना वाले पन्ने पर समझाया गया है।

पैसा कैसे और कब आता है
मंज़ूरी के बाद रक़म एक साथ नहीं आती। वह किस्तों में आती है और हर किस्त मकान के काम की जाँच के बाद ही जारी होती है। नींव, दीवार और छत, इन पड़ावों पर फ़ोटो और जियो टैग के साथ रिपोर्ट चढ़ती है, फिर अगली किस्त मिलती है।
पैसा सीधे बैंक खाते में जाता है, और खाता आधार से जुड़ा होना चाहिए। पहाड़ी और कुछ विशेष इलाक़ों में रक़म ज़्यादा रहती है, और मनरेगा से मज़दूरी के दिन तथा शौचालय का अनुदान इस योजना के साथ जोड़े जाते हैं।
नाम न हो तो क्या करें
पहला क़दम ग्राम सभा है। छूटे हुए पात्र परिवारों को जोड़ने के लिए अपील की प्रक्रिया रहती है, जिसमें ग्राम सभा प्रस्ताव पास करती है और वह ब्लॉक होते हुए ऊपर जाता है। दूसरा रास्ता ब्लॉक कार्यालय में लिखित आवेदन है, जिसकी पावती ज़रूर लीजिए।
जिन परिवारों के पास पक्का मकान, चौपहिया वाहन, सरकारी नौकरी या तय सीमा से ज़्यादा ज़मीन है, वे योजना से बाहर रहते हैं। ऐसे मामलों में अपील से भी नाम नहीं जुड़ता।
ज़मीन का काग़ज़ और मकान
मकान उसी ज़मीन पर बनता है जो लाभार्थी के नाम हो या जिस पर उसका वैध क़ब्ज़ा माना गया हो। कई जगह काम इसलिए रुकता है क्योंकि ज़मीन दादा या पिता के नाम है और बँटवारा रिकॉर्ड में नहीं चढ़ा। ऐसे में पहले रिकॉर्ड सुधरवाना पड़ता है।
राज्यवार पोर्टल और नियम पीएम आवास योजना वाले हिस्से में दिए हैं, और अपने गाँव का रिकॉर्ड गाँव के आँकड़ों वाले टूल से देखा जा सकता है।
ध्यान रखने लायक़ बातें
- सूची देखना मुफ़्त है और किसी पहचान की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- नाम जुड़वाने के नाम पर पैसा माँगा जाए तो वह ठगी है।
- हर किस्त की जाँच होती है, इसलिए काम की फ़ोटो समय पर चढ़वाइए।
- मकान अधूरा छोड़ने पर अगली किस्त रुक जाती है और वसूली भी हो सकती है।
FAQs
सूची आवेदन से नहीं बनती। यह सामाजिक आर्थिक जनगणना के आँकड़ों से बनती है और उस पर ग्राम सभा मुहर लगाती है।
पंचायत के स्तर पर। एक पंचायत में कई गाँव होते हैं, इसलिए सूची देखने के लिए पंचायत का नाम पता होना चाहिए।
किस्तों में। नींव, दीवार और छत के पड़ाव पर जाँच और फ़ोटो के बाद ही अगली किस्त जारी होती है।
ग्राम सभा में अपील की प्रक्रिया रहती है, और ब्लॉक कार्यालय में लिखित आवेदन दिया जा सकता है। पावती ज़रूर लीजिए।